"An Army At The Feet Of Jesus"



My chains are gone , I've been set free 
My God, my Savior has ransomed me
And like a flood His mercy rains
Unending love, Amazing grace

मैं सूर्यकांत , आज आपके समुख उस खुदा का एक गवाह बनकर,अपनी गवाही बताने जा रहा हु | एक ऐसी घटना आपके साथ साझा करना चाहूंगा जो मेरी जिंदगी की मोड़ साबित हुई , जिसने मेरी जिंदगी को एक नै रौशनी दिखा दी, और मेरी हैवानियत भरी दिशाहीन भटकती जिंदगी को सत्य की राह दिखा दी | 
मैं मेरा सफर आपको बताना चाहता हूँ, जो मेरे घर से कब्रों , और फिर कब्रों से फिर घर लौट आया |
मैं एक ऐसा इंसान जो एक सांसारिक घर के निवासी से कब्रों का निवासी हुआ, लेकिन एक घटना ने मुझे उन कब्रों के निवासी से आत्मिक घर अर्थार्थ उस अनंत जीवन का निवासी बना डाला | 

मैं जिस गाँव में रहता था , उस गाँव का आतंक व् उस गाँव की मौत था मैं सूर्यकांत | मैं एक गन्दा इंसान था, लोगो को सताना, चोर्रियाँ करना, लोगो से उनकी वस्तुएं छीनना आदि सारे पाप करना मेरे खून में था | कोई लोग मुझे पसंद नहीं करते थे |  

मेरा घर कब्र था, वैसे तो कब्र मरे हुओ की जगह होती है, लेकिन में जीवित होकर भी, सब लोगो के लिए मरा हुआ था | ना कोई दोस्त,  ना कोई रिश्तेदार, ना कोई जानकार, ना कोई अपना.... बस था तो सिर्फ ...... लाशें, घोर अंधकार, विरानताएँ और 6000 दुष्टात्माओ का एक अड़ा, जो मैं खुद था ...     
अरे !!! हाँ .... मैं आपको बताना भूल गया.... मेरे में एक समस्या थी ... मैं एक सेना अर्थाथ , 6000 दुष्टात्माओ का एक अड्डा था ... | 

मेरा खुद पर कोई अधिकार नहीं था, मैं वो ही करता जो दुस्तात्माएं मुझ से करवाती थी | लोगो ने बार- बार मुझे कभी बेड़ियों, तो कभी सांकलों से बांधा लेकिन मेरे अंदर की सेना इतनी  सामर्थी थी, की उस सांकलों को तोड़ और उन बेड़ियों के टुकड़े टुकड़े कर देती थी  | कोई मुझे अपने वश में नहीं कर सकता था.... 

मैं खुद.... खुद क्या ??, मेरी सोच, मेरी चाह, सब उस सेना के वश में हो गया था, मैं अपने आप को नग्न्ता से भी बचा नहीं पाता था....सरल भाषा में कहे तो ... मैं एक बेइज़्ज़त इंसान हो गया था... बस रात-दिन कब्रों और पहाड़ो पर चिल्लाता रहता था  ... | 

इन 6000 दुस्तात्माओ के सामने दुनिया की हर शक्तियां कमजोर व् नाकाम हो चुकी थी, सभी शक्तियों ने हार मान इनके सामने झुक चुकी थी व् इन्हे अपना प्रभु मान लिया था ||   

ये दुष्टात्माएं हमेशा मुझे जान से मारना चाहती थी, इसीलिए  वो रात- दिन इसी  ताक में रहती  थी कैसे भी करके मुझे मार डाले| मैं अपने आप को दुस्तात्माओ के कारण नुकीले पथरो से जख्म देता था.. सताता था.. एक जख्म भरता नहीं उस से पहले हर रोज नया एक जख्म मेरे शरीर पर रहता .... एक बहुत कमजोर अवस्था ...

मैं जब  भी किसी से मिलने जाता, तो ये ६००० दुस्तात्माएं मुझे मिलने से rok देती थी...मैं एक ऐसे बंधन में बंध गया था,  जहाँ से चाह कर भी आज़ाद नहीं हो सकता था | मेरी खुद की शक्तियां मुझ में कम हो गई थी... और उन दुस्तात्माओ की शक्ति बढ़ चुकी थी ..... कोसो दूर कोई ऐसा नहीं था जो मुझे देख मुझे आज़ाद करे.......
एक ऐसी अवस्था  जहाँ  से मेरा बचना बहुत मुश्किल था,,, मेरी जिंदगी में सिर्फ अंधकार, निराशा , विरानता. ...... और कुछ नहीं.....  हर दरवाजे बंद हो चुके थे... कोई राह नहीं  ...एक भी नहीं ... 

लेकिन इसी बीच.... एक शक्श ने वहां अपना कदम रखा ..... मैंने से उसे दूर..... से देखा ... मैं उसकी और दौड़कर उसके पास गया.... लेकिन पता नहीं.... आज वो ६००० दुस्तातामायें कमजोर पड़ रही थी ...  क्यूंकि वो मुझे किसी से मिलने नहीं देती थी,लेकिन आज मुझे वे रोक नहीं पा रहे थे ..वे कोशिशे कर रहे थे लेकिन.. .उसमे इतनी ताकत, इतनी शक्ति नहीं थी की वे मुझे उस शक्श  से मिलने से रोक सके ....!!!! मेरे उस शक्श के सामने आते ही वो ६००० दुस्तातामायें थर-थर कांपने लग गई ....और उसके समुख झुक गया.... और उस से प्रार्थना की ...  " की है प्रभु.... हमे पीड़ा ना दे !!!!!!!   



- आज तक हर जन इन दुस्तात्माएं से डरता था , लेकिन आज पहली बार ये दुस्तातामायें किसी के सामने डरती नजर आई... 
- आज तक इनके सामने सब शक्तियां, लोग झुकते थे,,, लेकिन आज पहली  बार  ये दुस्तातामयें उस शक्श के सामने झुक गया.... 
- आज तक इनके सामने हर जान कांपता था,,, लेकिन पहली बार ये दुष्टातमाएँ  उस शक्श के सामने कांपती नजर आई  
- आज तक इन्हे प्रभु कहा जाता था... लेकिन आज ये उस शक्श को प्रभु कहती नजर आयी ....
- आज तक इनके सामने लोग विनती किया करते थे, लेकिन आज इन्होने उस शक्श से विनती की ..." की है प्रभु...हमे पीड़ा ना दे... हमे उन सुअरो  में जाने की आज्ञा दे....  

उस शक्श ने उन्हें आज्ञा दी... और वो उसकी बात मानकर उन २००० सुअरो में जाकर पैठ गई ... और सुअरो ने जाकर आत्महत्या करली... और मैं उसी वक्त आज़ाद हो गया..... 

अब मेरे सामने कुछ सवाल उठे .....
१. आखिर क्या वजह थी की मैं अपने आप को इतना मरता, घायल करता, नुकीले पथरो से चीरफाड़ करता  ... लेकिन आज तक मरा नहीं ...?? क्यू ?? 
२. २००० सुअरो में - ६००० दुस्तात्माएं ,.... मतलब एक सूअर में ३ दुस्तात्मा  और वो एक बार में ही मर गए....लेकिन इतने सालो से एक ही इंसान ( मुझ me ) में ६००० दुस्तातामायें ... लेकिन में मरा नहीं .... क्यू?? 

इसका जवाब मैं खुद आपको देता हूँ ..... 
सिर्फ और सिर्फ उस खुदा के प्यार के कारण ...
क्यूंकि उसने मेरे जनम से से पूर्व ही से मुझे चुन लिया था....
मुझे महसूस होता था , जब भी मैं अपने आप को मारता था... घायल करता था... तब एक अद्र्श्या शक्ति,  एक अवर्णित, असीमित सामर्थ  ने मुझे संभाल कर रखा ... और उस शक्ति ने  मुझे तब तक संभाला , जब तक की मैं उस शक्श अर्थात यीशु मसीह  मिल ना गया.... ये उस खुदा का प्यार नहीं तो क्या है... उसी शक्ति ने मुझे तब्हा होने से बचा लिया. 
अब मैं आज़ाद हूँ ... यीशु ने मुझे आज़ाद कर दिया 


- मैं शैतान का शिकार था... लेकिन आज मैं उस मसीह की महिमा का गवाह हूँ ... 
- मैं अपमान का पात्र था ...लेकिन आज मेरे प्रभु  के कारण  एक सामान का पात्र हूँ ....
- मैं दुनिया की नजर में मर चूका था... लेकिन मैं आज प्रभु में जी गया हूँ... 
- मुझ से कोई मिलना नहीं चाहता था... लेकिन आज मुझे वो मिल गया .. जिस के कारण मेरा पूरा गावं, मुझ से            मिलना चाहता है... 
 
अब मेने मेरी जिन्दी यीशु को दे दी है .. अब मैं उसके लिए जीऊंगा ... क्यूंकि, वो उस गाँव में सिर्फ मुझे आज़ाद करने  को ही आया था ... वो मुझ से प्यार करता है, पाप के ससग़र की गहराई में था मैं, मेरे चारो और अँधेरा था... उसके हाथ मुझको ढूंढ कर आया, और अपने सीने से लगा लिया ...... 

..... मैं एक गरीब और असहाये कीड़ा हूँ, और सिर्फ मुझ तुच्छ के लिए ही वो विपरीत परिस्थितयों का सामना करके आया की मुझे इस योग्य बनाएं की में उसकी खुशखबरी को लेकर, मेरी ही जगह में, मेरे ही गाँव में उस खुदा का प्रचार कर सकूं |  
वो हम से प्यार करता है, हमे चाहता है, हमे धर्मी ठहराना चाहता है.. और हमे पुत्र बनाना चाहता है ..... 
बस यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गवाही है... व् मेरा ये सफर जो कभी  घर से कब्र की और गया था , कब्र से वापिस घर पहुंच गया... फर्क बस इतना है ... की  इस बार वो घर सांसारिक नहीं आत्मिक घर है ....ये सब सिर्फ और सिर्फ  यीशु की वजह से .


- Mark ( मरकुस ) - 5 : 1-20 

- Ashish George 


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