Aag
अनसुलझी बातें सुलझने लगी हैं,
बिखरी यादें फिर संवरने लगी हैं।
खामोश था अब तक, अब वक्त आ गया है,
बुझती आग जो सुलगने लगी है।
धुआँ समान प्रवाहमान, अब शोला बन दहक उठूंगा,
दब चुके थे अरमाँ जो, तूफां सा मचल उठूंगा,
थम गई अंधेरी राहे, अब उजालों में चमक उठूंगा,
टूटा, बिखरा, बिसरा मैं, अब संजोड कर संवर उठूंगा |
चुप था जो सदियों से कहीं, अब गूंज बन धड़क उठा है,
झुका था जो वक़्त के आगे, अब सैलाब बन उमड़ उठा है,
गिरते गए जो अश्क कभी, अब मोती बन झलक उठा है,
खो गया था शोर में, अब सुर बन गरज उठा है |
मंज़िल अब दूर नहीं, कदम जो अब चल पड़े हैं,
आंधी-तूफान रोक नहीं, इरादे जो पलट चुके हैं।
संघर्ष की लौ मै उम्मीद की किरण प्रखर चुकी है,
बुझती सुलगती आग भी आखिर जो दहक चुकी है।
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