Aagaz: A Story

AAgaZ…
Safar-e-Mohabbat
A Imaginative Story
By: Ashish George

जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है की वह रहस्यमय होता है, अर्थार्थ जिंदगी अपने आप में एक अनजानी और अनकही घटना होती है| इसका हर पहलु, हर मोड़ और हर पल कुछ नया और अजनबी होता है|  हम जितना इसे समझने की कोशिश करते हैं, उतना ही उसमे गहरा रहस्य छिपा रहता है। और यही एक प्रशन है, जिसका हमारे पास कोई जवाब भी नहीं होता है की "हमारा कल कैसा होगा" ? और सच मे ज़िंदगी जीने का सबसे बड़ा मज़ा भी इसी में है की हमारा अगला पल अंजान है|
कभी कभी यही ज़िंदगी हमें ऐसे अनुभवों से परिचित करवा जाती है जो हमारे सोच और जीने का नजरिये को ही बदल देते है| एक अंजाने वक़्त पर एक अनजाना इंसान कब हमे ज़िंदगी जीने की नई दिशा देदे, एक नई परिभाषा देदे, इसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते है| और सच मे ज़िंदगी जीने का मज़ा तभी आने लगता है, जब हमें इस बात का एहसास हो जाता है की आने वाला कल के बारे मे हमें कुछ नही पता|
मेरा नाम है साइमन. आज अपने ज़िंदगी के कुछ पन्नो को आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ| अनुभव है उन कुछ पलों का जब मेरा जीवन मौत और ज़िंदगी का चुनाव कर रहा था| मैं अपने जीवन मे हमेशा से एक हारा हुआ इंसान था| हमेशा से ऐसा नहीं था, लेकिन जिंदगी के उतार चढावो ने मुझे लपेट कर ऐसा फेंका, की मैं दुनिया का सबसे बदनसीब इन्सान बन गया|  
पेशे से मछुहारा था| दिन रात मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता था | था मैं गरीब, और इस गरीब को बड़े बड़े मालिको का सहारा होता था | खुद की नाव नहीं थी मेरे पास, उन्ही मालिको से उधार लेकर, मैं मछली पकड़ता था, और उन मछलियों को बाज़ार में बेच थोड़े बहुत पैसे कमा लिया करता था लेकिन मालिको को उसमे किराया देने के बाद, थक हार कर हाथ में सिर्फ कुछ पैसे बचते थे| और सच में, वो भी काफी था, आपको तो पता ही होगा गरीब अपने घर आये पैसे को कभी नहीं गिनता है, उसकी खोली में जितना भी आये, वो उतने में खुश हो जाता है | इसी तरह मेरी जिंदगी भी कट रही थी, हर दिन सुबह सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ नाव लेकर निकल पड़ते, शाम होते होते जितनी मिलती उतने से काम चलाना पड़ता था | जरुरी नहीं था सब प्रयास सफल थे जिंदगी में, कभी कभी खाली हाथ, नाकाम कोशिशो के साथ लौट आना पड़ता था| जिंदगी थी साहेब!! गुजारनी तो पड़ेगी |  
मेरे पिता जी मुझ से पहले यही नाव चलाया करते थे, लेकिन अब बीमारी की वजह से अधिकतर बिस्तर पर ही रहते थे| मेरी माता जी, गृहिणी थी, घर के काम, अपने पति की सेवा करना ही हमेशा से उनका धर्म रहा था | मेरी पत्नी ज़ारा, बच्चों और घर का देखभाल करती थी, लेकिन मेरी गरीब अवस्थाओं के कारण, मुझ से नाराज रहती थी| मेरे बच्चे मुझ से मोहब्बत करना चाहते है, लेकिन चाह कर भी नहीं कर पाते क्योंकि मे उनके लिए एक अच्छा पिता होने का अंदाज़ जो नहीं निभा पा रहा था | मांगे बहुत थी घर पर, लेकिन देने के नाम पर मेरे पास सिर्फ ख़ामोशी|
एक दिन की बात है, एक भाविश्य्द्वाकता नदी किनारे मन फिराव का सन्देश लेकर आया और लोगो को बप्तिस्मा देने लगा, वो किसी आने वाले की बात करता था जो बहुत सामर्थी है, पता नही कौन था ?!! खेर, बहुत से लोग उस से बप्तिस्मा लेने आने लगे थे| एक दिन मैं मछली पकड़ने गया तो मैंने सुना की भाविश्य्द्वाकता आपने चेलो से किसी की और इशारा करते हुए कोई बात कर रहे थे | हाँ मैंने सुना उनकी बातो को, और जैसे ही उनकी बात पूरी हुई वो दोनों चेले उनको छोड़ कर उस इंसान के पीछे हो लिए | मेरे लिए अजीब सी बात थी, क्यूंकि यह गलत बात है, की आप अपने मालिक को छोड़ किसी और के पीछे हो लेते हो, मुझे पसंद नही आया था यह सब| मैंने उस भ्विश्य्द्वाकता से पूछा की वो आपको छोड़ कर क्यूँ चले गए, उन्होंने कोई जवाब नही दिया, बस मुकुराए और चले गए | खेर मेरे क्या है, उनके खुद के गुरु ने उन्हें नही रोका तो में कौन होता हूँ.... हमारा रिश्ता तो सिर्फ अपनी नाव और इन मछलियों से है, जो कुछ देर में हमारे जालो में फंसने वाली है | यूँ ही जिंदगी गुजरती रही, दिन महीनो में, महीने सालो में बदलते चले गए, और हम उन्ही नावो पर सवार मछलियों के पीछे भागते चले गए |
लेकिन कहते है है की  "अच्छा वक़्त कभी नहीं टिकता," और सच में, ऐसा ही हुआ। आज सुबह से आसमान में काले बादल घिरे हुए थे, और मूसलधार बारिश शुरू हो गई थी। लहरें इतनी तेज थीं कि उनका आक्रोश महसूस हो रहा था, जैसे नदी खुद हमें अपनी चपेट में लेना चाहती हो। दिल कह रहा था कि आज मछली पकड़ने के लिए हमें नदी में नहीं उतरना चाहिए। लेकिन मालिक का आदेश था, और उन्हें नकारा करने की हिम्मत नहीं थी।
नदी की लहरें पहले जो हल्की-सी थीं, जैसे-जैसे समय बीतता गया, वे तेज़ होती गईं। अब इन हवाओं ने तूफ़ान का रूप लेना शुरू किया, और हम नदी में मध्य में फंसते चले गए | कुछ नहीं समझ में आ रहा था, बस नाव को किनारे तक ले जाने की लाचार कोशिशे करता जा रहा था | बड़ी कोशिशो के पश्चात मेरी नाव किनारे पर लग ही रही थी की अचानक उसकी नोक एक बड़े पत्थर से टकराई, और उसके नीचे गहरा खड्डा बन गया। मालिक को जैसे ही इस घटना का पता चला, उनका गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था। उन्होंने मेरे सामने आते ही घबराए हुए शब्दों में कहा, "तुम क्या कर रहे थे? एक नाव तक संभाल नहीं सकते!" "यह सब तुम्हारी लापरवाही की वजह से हुआ है," उनका स्वर कठोर था, और उन्होंने मुझे कल से अपनी नाव न देने का एलान कर दिया | मैंने कई बार उन्हें माफी मांगी, लेकिन उनका दिल नहीं पिघला।
मुझे दुख इस बात का नहीं था कि मेरी नौकरी चली जाएगी, दुःख इस बात का था की मेरे परिवार के चेहरे पर जो उम्मीद थी, वह अब टूटने वाली थी। मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं था। सिवाय इन लहरों के बीच के संघर्ष के, और मछली पकड़ने के अलावा मैं और कुछ नहीं जानता था। यही मेरी कमजोरी थी, यही मेरा अतीत था। और यही मेरा सत्य था |
मैं घर की ओर लौट रहा था, मन में बहुत भारीपन महसूस हो रहा था। मैंने महसूस किया कि जीवन में अगर एक रास्ता बंद हो जाता है, तो दूसरों का सहारा भी टूटने लगता है। मैं नहीं जानता था कि अब मुझे क्या करना होगा, क्योंकि वह सबसे बड़ा हुनर जो मैंने सीखा था, वह अब मेरे पास नहीं था।
मुझे नहीं पता अब आगे क्या होगा, लेकिन इतना तय था की आने वाले दिन मेरे लिए आसान नही होने वाले थे, जहाँ मैं अपने परिवार के लिए कुछ नही कर सकता हूँ | दुःख था की बगैर किसी गलती के मुझे अपने काम से हाथ धोना पड़ा| रात की अँधेरी चादर रौशनी के दीयों को बुझा ले जा रही थी | अब क्या करूंगा, आगे क्या होगा, मेरे परिवार का क्या होगा, मेरे पिता की दवाइयां, मेरे बच्चो का भविष्य इन सवालों के भँवर में मैं उलझता जा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मेरे सपनों की इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई हो। मन के भीतर दर्द था, आँखों में भार था, और मैं उन अनसुलझे सवालो के सैलाब के मध्य आँखे बंद कर निंदिया में समां गया | मुझे यकीन था कि यह अंधेरा रात का था, लेकिन सवाल यह था कि क्या मेरा सूरज फिर से कभी उगेगा?
अगले दिन, मैं निकल पड़ा नए काम की खोज में, मुझे पता था कि मेरे पास बैठने और हार मानने का समय नहीं है। मैं निकल पड़ा, एक नई शुरुआत के लिए। मुझे काम चाहिए था, किसी भी तरह का, जिससे मैं अपने परिवार का पेट भर सकूं। लेकिन सच यही है कि गरीबी, बदनसीबी, और मजबूरी इंसान को इतना कमजोर बना देती है कि वह अपनी काबिलियत पर भी शक करने लगता है। मैंने दिनभर सैकड़ों जगहों पर काम तलाशा। पर हर जगह से खाली हाथ लौटना पड़ा। सच कहूँ, तो मुझे और कोई काम करना आता ही नहीं था। बचपन से लेकर अब तक मैंने केवल मछलियाँ पकड़ने का ही काम सीखा था। वही हुनर मेरा सहारा था, लेकिन अब वो भी मुझसे छिन गया था।
ज़िंदगी ने अपनी एक नई लय स्थापित कर ली थी। अब हर सुबह एक ही रट थी—काम की तलाश में घर से निकलना और शाम को खाली हाथ लौट आना। यह सिलसिला ऐसा बन गया था, मानो मेरी नियति ने इसे अपनी दिनचर्या में बदल लिया हो। हर सुबह उम्मीद की हल्की किरण लेकर उठता, लेकिन हर शाम असफलता का घना अंधेरा अपने साथ लेकर लौटता। रात के अंधेरे में, अकेले बैठकर खुद से लड़ता। दिल में बस अनेक सवाल जिनका कोई जवाब नही था शायद | सच में ज़िंदगी ने मुझे एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ से हर रास्ता बंद सा लग रहा था। न कोई उम्मीद की रौशनी न कोई सहारे की छाँव | ऐसा लगता था की जिंदगी एक ऐसी बंद किताब बन चुकी हो, जिसमें सिर्फ अधूरे पन्ने और दुःख, दर्द, असफलताओं की कहानियाँ लिखी हों।
अब जो भी मुझे देखता, मेरे आसपास के लोग, जानकार, मेरे खुद के अपने सब कोई मुझे इसी नाम से परिभाषित करते थे| मैं जहाँ जाता, जिन भी दफ्तरों मे, बस पराजय, असफलताओ का बोझ ले कर लौट आता था | खामोश था, अपनी ज़िंदगी से नाराज़, किस्मत की तलाश, लेकिन असफलता का जो साथ था | मेरे माता पिता पर बोझ, मेरी पत्नी और बच्चे, उनके लिए मैं एक निकम्मा, जो उनको ख़ुशी के बदले गम के आँसुओ से सजाता था |  पिता जी दवाइयाँ, घर का राशन, पत्नी और बच्चों की माँगो के सामने मे असहाय, दर्द का मारा था |
असफलता का डर मेरे अंदर घर कर गया था, लेकिन इतनी असफलताओ के बावजूद मे हर दिन किसी काम की तलाश मे निकलता था | लेकिन हर बार अयोग्यता का ठप्पा, हर बार अस्वीकृति, यह मेरी नियति बन गई थी। रोज़ एक ही कहानी, चेहरे पर वो हताश मुस्कान और अंदर का तूफ़ान। मुझसे पहले ही लोग मुझे देखकर मना कर देते थे, जैसे मैं केवल असफलता की निशानी बन गया था।
वक़्त, ज़िम्मेदारी के भार के साथ साथ, समाज़ के ताने, परिवार के ताने, हर दिन मुझे कमजोर करते गए | नौकरियां मिलती, अयोग्यता के कारण, मुझे अस्वीकृत कर दिया जाता रहा, कभी बेवजह आरोपों के तहत तिरस्कृत कर दिया जाता | बड़े आशाओं के साथ सुबह की रोशनी मे घर से निकलने वाला मैं, रात के अंधेरो मे फिर खाली हाथ लौट आता था | मेरे इंतज़ार मे बैठी मेरी पत्नी का चेहरा फिर मायूस हो जाता था| मेरे बच्चों की आँखों में भूख और मेरी आँखों में हताशा— ये पल मुझ दिन के आधे अधूरे टूटे हुए को पुरा तोड़ देते थेतब महसूस होता  कि मेरी असफलता सिर्फ मेरी नहीं थी, यह अब मेरे परिवार की सज़ा बन गई थी|
एक दिन, काम की तलाश से, असफलताओ से भरा मे जब लौटा, मैंने देखा की मेरा घर खाली था, मैंने आवाज़ लगाई मेरी पत्नी को, बच्चों को, लेकिन मुझे जवाब देने वाला घर पर कोई नहीं था | कुछ काबिल न होने के कारण, कुछ कर न पाने के कारण, मेरी पत्नी ज़ारा, बच्चों के साथ अपने मायके लौट चुकी थीअब मेरे पास कोई नहीं था, बात करने को, मेरा साथ देने कोसच मे उस समय मुझे लगा कि मेरे अंदर का जीवन पहले ही मर चुका है। मैं खाली था, बस एक जीता-जागता साया, बिना उम्मीद, बिना दिशा। आज मुझे दुख हुआ अपनी किस्मत पर, मुझे दुख था अपने अस्तितव् पर, मुझे दुख था उस खुदा पर, कहते है की सब उसकी मर्ज़ी से होता है, क्या उसकी मर्ज़ी यही थी की मैं इस तरह की ज़िंदगी जीयु, की मैं अपने परिवार के लिए कुछ न कर सकूँ अनेक बार मेरे साथ बेईमानी हुई है, मुझ पर कई बार  बेवजह आरोप लगे है  लेकिन सच मे मैंने ज़िंदगी का हर पल, हर वक़्त, ईमानदारी से जिया था , फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों??
सवाल अनेक थे जिनका मेरे पास जवाब नही था| अब हर गलियां मुझे जानती थी हर रास्ते मुझे पहचानते थे, लोगो की नज़र मे मैं अब बेवकूफ, आवारा इंसान था, जो जहाँ जाए असफल था | समाज़ के बाद, मेरे परिवार ने भी आखिर मुझ से मुँह मोड लिया था | उस पल मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरी पहचान मिट गई है। अब मैं न सिर्फ अपने परिवार के लिए, बल्कि खुद के लिए भी कोई मायने नहीं रखता। सड़कों पर चलना भी अब बोझिल हो गया था, जैसे हर कदम मुझे और गहरा गड्ढे में धकेल रहा हो। रातों को नींद नहीं आती थी, और अगर आती थी तो डरावने सपनों से भरी होती थी, जहाँ मैं खुद को अकेला और असहाय पाता। सुबह खौफ और अंधेरो मे जीता, खामोश सा इंसान मैं अब घर पर ही कैद होने लगा |
मुस्कुराते थे कभी जो लब, खामोश हो चले है अब, खुले आसमानों मे उड़ने वाले परिंदे, पिनज़रो मे कैद हो चले है अबघूरे से उभरते थे जो अक्स, फिर मिट्टी मे कहीं मिल चले है अब, दर्द से भरे थे जो जख्म, फिर दर्द से कहीं छिल चले है अब, बड़ी हलचलो से गुज़रती थी जो ज़िंदगी, सुनसां गलियों का सन्नाटा हो चुकी है अब, रोशनियों से सज चुकी थी जो ज़िंदगी, अंधेरो से कहीं उब चुकी है अब|
मेरे लिए अब एक और दिन बीतने का मतलब था और दर्द, और निराशा, और अकेलापन। मुझे लगने लगा कि शायद मेरे लिए इस दुनिया में कुछ नहीं बचा। एक रात मे निर्णय ले लेता हूँ, की कल मेरा इस दुनिया मे आखिरी दिन होगा, मैं आत्महत्या कर लूंगा | आज मेरे बचपन का वो मसुमियत भरा चेहरे से लेकर ये खामोश चेहरे तक का सफर मुझे अपनी आँखों के सामने दिख रहा था | मेरी ज़िंदगी का हर पल, मैंने ईमानदारी से जिया था, किसी को कुछ भला बुरा नहीं कहा, लेकिन हर पलो मे मैंने बस खुद को हारता हुआ ही देखा | हर दिन जो मैंने मर मर कर जिया, समाज,दोस्तो, परिवार का बिछुड़ना, उन के ताने, उफ़...  अब बस, बहुत हो चुका था... कोई माफ़ी के काबिल नहीं था, खुदा भी नहीं | कल मे चला जाऊंगा हमेशा के लिए | मेरे खामोश लबो ने उस खुदा से आखिरी प्रशन पूछा  "की ए खुदा, तूने मेरे साथ ऐसा क्यों किया??  और फिर मैं सुबह होने का इंतज़ार करते करते वहीं नीचे सो गया |
जब उठा, सुबह का सूरज निकल चुका था, लेकिन फिर भी भीतर अंधेरा गहराता जा रहा था | खामोशी ने जकड़ लिया था, जैसे मेरे हर शब्द, मेरी हर भावनाएं कहीं खो गई है | अपनों की खुशियों का कत्ल करने वाला, बेहोश सा, चल पड़ा अपने ख्यालों मे डूबा, एक वीरां जगह आत्महत्या करने | चारों तरफ सिर्फ सन्नाटा, न कोई आवाज़, न कोई इंसान, वक़्त भी मानों ठहर सा गया हो, मेरे कंधे किसी अदृश्य बोझ से दब रहे थे, मानो मे आज खुद अपनी हर असफलताओ का बोझ, रिश्तों के टूटने का बोझ उठाये मैं चल रहा हूँ| दिल मे गहरे घाव थे, जो किसी को नज़र नहीं आ रहे थे, लेकिन हर धड़कन के साथ चुभते जा रहे थे | हर कदम उस वीरां जगह को करीब ला रहे थे, जहाँ मैंने आत्महत्या का अंत ढूंढा था |
अचानक पता नहीं कहाँ से वो खामोशी, शोर मे बदलने लग गई|
चलते चलते, मैंने देखा एक बड़ी भीड़ को जो धीरे धीरे मेरे करीब से गुजरने पर थी | मैंने देखा की वहाँ सेना के जवान भी मौजूद थे, शायद कोई आपसी मतभेद हुआ होगा सोच कर मैं आगे निकलने लगा, लेकिन मैं जितना उस शोर से दूर चलता जा रहा था, वो शोर मुझे अपनी और खींचता जा रहा था | मैं वही रुका और उस अजीब से शोर की तरफ जो अक्सर मेरे शहर मे नही उठता है, अपने कदम बढ़ा दिये | मैं धीरे धीरे उस भीड़ के पास पहुंचा, और देखा की एक शक्स खूँ से लतपथ, जो क्रूस का बड़ा भार लिए चला जा रहा था, कोई उस पर थूक तो कोई उस पर चिल्ला रहा था कोई उस के लिए रो तो कोई उस पानी पिला रहा था चारों ओर से लोगों की आवाजें गूँज रही थीं, पर उस शख्स की खामोशी हर शोर को चीर रही थी। वो यूँ ही खामोश सा, हर दर्द को सहता हुआ, हर भार को लेकर चला जा रहा था | कभी वो नीचे गिरता, वो फिर उठता अपना क्रूस लेकर फिर चल पड़ता, यूँही गिरते पड़ते वो चल रहा था |
 मैं अपने आप को वहाँ रोक नहीं पाया, मैं वहाँ से जाने के लिए पीछे मुड़ा, की अचनाक एक सेना के जवान ने मुझे रोक लिया | उसने मुझे जोर से खिंचा और उस शक्स के पास नीचे गिरा दिया | मुझ से जवान ने कहा की मैं उस शक्स की मदद करु क्रूस उठाने में | मैंने एक पल सोचा की वैसे भी मौत को अपनाने जा रहा था मैं, मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है, तो कोई न आखिरी मदद करके मैं चला जाऊंगा | मुझे नहीं पता था की मेरी ज़िंदगी में अगले पल क्या होने वाला है | मैंने उसका क्रूस उठाया, और उस नीचे पड़े शक्स को उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया | और अचानक उसकी नज़रे मेरी नज़रों से मिलती है, उफ्फ...वो नज़रों की मुलाकात मेरे दिल को चीर गई। उन नज़रों को मैं कभी नहीं भूल सकता हूँ, क्योंकि मुझे देखते ही उसकी आँखों मे मैंने दर्द के साथ मोहब्बत के अंश को देखा |
वो दर्द जैसे वो मेरे लिए सहा गया हो सबकुछ, जैसे हर चोट, हर जख्म मेरे ही गुनाहों की कीमत थी। उसके चेहरे पर वो मोहब्बत भरी मुस्कान  जैसे उसने मेरा सारा दुख अपने अंदर समेट लिया हो, ताकि मेरे हिस्से में सिर्फ मोहब्बत और माफी रह जाए।
मैं उसका क्रूस लिए चल रहा था, वो मेरे साथ, मेरा हाथ पकड़ कर चल रहा था, चारो तरफ के शोर के बीच वो खामोश था, दर्द मे था, पीठ पर कोड़े पड़ रहे थे उसके, लोग उस पर थूक रहे थे, कल जिन्होंने इसको चाहा था  आज वही इसको मार डालना चाहते थे | मुझे याद है उसके वो शब्द जो उसके सताव के बाद उसने कह की ए खुदा, इन्हे माफ कर ये नही जानते ये क्या कर रहे है | मैं हैरान था, इतने दर्द, सताव के बावजूद वो सभी को माफ करता था, और एक मैं था जो मेरे हर अपनो को माफ न करने का मन बना कर निकला था |
कदम दर कदम मैं चलता गया उसके साथ, मौत के साये मे खो जाने के लिए निकला मैं, अब लग रहा था की जीवन की रोशनी की ओर जा रहा हूँ | लग रहा था मानो मेरे बंजर पड़ी अवस्था पर आज उम्मीद की बुँदे टपकी है | मै उसको देख रहा था, उस के सामने अपनी बात रखने की चाह ऐसी थी मनो एक सुखा टूटा पत्ता फिरसे अपने पेड़ से जुड़ने की छह कर रहा हो| कोई शिकायत नहीं थी, खामोश सा वो क्रूस उठाये चला जा रहा था, मानो वो क्रूस का भर नहीं मेरे हर वक़्त के पाप का भर लिए जा रहा है| उसकी मोहब्बत जैसे मेरे शुन्यता में सब कुछ नया बना रही हो, और मुझे उसी मोहब्बत से सींच रही हो | उसका बहता लहू, मेरी नसो मे नई ताज़गी भरता रहा, उसका रूह का असर , उसमे से निकल के मुझमे समाता रहा, उसके हर कदम. मेरे लिए नया रास्ता बनाते गए, वो अपनी खूबसूरती को वो बदसूरत करता चला और मुझ बदसूरत को वो खूबसूरती की तरफ खींचता चला जा रहा था| सच मैं, कुछ पल जो मैंने इस इन्सान के साथ जिए, मेरे जीने की सोच बदल चुकी थी|
यूँ ही धीरे धीरे चलते, सेनिक उसे एक पहाड़ी पर लेगे, जहाँ उसे क्रूस पर चढ़ाया जाना था| सेनिको ने वहां पहुँचते ही उसे मुझ से अलग कर दिया गया | और महसूस कीजियेगा, जैसे ही उसे क्रूस पर लेटाया गया, उसकी नज़रे फिर मुझे देखती है, उसके चेहरे पर मोहब्बत भरी मुस्कान थी| मैंने समझ नही पा रहा था, उसकी इस मुस्कान को, जब तक मैंने अपने चारो तरफ नजर नहीं दौडाई | मैंने देखा चारो तरफ, मैं हेरान हो गया, यह वही जगह है जहाँ आज इसी वक़्त मैं अपने जीवन का अंत करने जा रहा था| मैं डर गया था, आज मैं अपना जीवन का अंत करने जा रहा था, लेकिन मेरे खातिर वो क्रूस पर चढ़ गया, मेरे पापो को अपने कंधो पर लिए मेरा मसीहा दर्द सह गे था | सच मैं जो सजा मेरी थी, जो दर्द मेरा था, जिस जगह सहना था, वो मेरी जगह मेरे लिए सबकुछ सह गया था| उसने मेरे जीने के नज़रिए को बदल दिया, कुछ देर पहले, बेमकसद की जिंदगी जीने वाला मैं,आत्महत्या करने निकला था अब उसने मुझे जीने का मकसद दे दिया था |
में उसे पहचान गया था यह वही शक्श है, जिसके लिए उस दिन उस भविष्यद्वक्ता ने कहा था “ के देखो वो खुदा का मेमना , जगत का पाप उठा लिए जाता है” | अब मैं समझ गया क्यूँ, वो चेले इस के पीछे हो लिए थे|
मैं दूर खड़े होकर मेरे मसीहा को क्रूस पर चढ़ते देख रहा था | कैसे किले उसकी निर्दोष हथेलियों को चीर रही थी, उसके घावो से खून बह रहा था | वो खामोश था, शांत था, क्यूंकि मेरी गलतियों की सजा वो सह रहा था | सच में, मुझे एक सच्चे खुदा से परिचित करवा कर उसने अपने प्राण त्याग दिए| अब मेरे अंदर आत्महत्या का विचार धोंध्ला हो चूका था, मेरा मसीहा चुप रह कर मौत को गले लगा गया, मुझे नही लगता अब ,मुझे अपनी परेशानियों से डरने की जरूरत थी | में इस जीवन को जो मुझे मोहब्बत में मुफ्त में मिला है उस मसीहा के लिए जीना चाहता हूँ अब | मन व्याकुल था, धीरे धीरे मेरे कदम वापिस अपने घर की तरफ बढ़ने लगे थे | बरसात की बुँदे ज़मीन को चूमने लगी थी मानो वीरानता में फिर जीवन का संचार हो रहा हो | मुरझाएं फूल फिर खिलने लगे थे | एक रंगी सूर्य, अस्त होते होते रंगीन रोशिन्यों से चमक रहा था, जैसे अंधेरो को भी रोशन करने की कोशिश क्र रहा हो | घर की ओर हर कदम मुझ में नयी उम्मीद और नयी शुरवात का अंदाज़ दे रही थी| बेमंज़िल जिंदगी को उसकी मंजिल का पता मिल चूका था, दर-ब-दर भटकते रहागीर को उसका रास्ता मिल चूका था, हर अधुरा लम्हा मुकम्मल को चूका था, आज इस खादिम को उसका मालिक जो मिल चूका था |
अब घर सामने था, और सच में आज की मुलाकात ने अपना असर करना शुरू कर दिया था, मेरी पत्नी ज़रा हमारे बच्चे के साथ दरवाज़े पर मेरा इंतज़ार कर रही थी | वो लौट आई थी | आज के माहोल में एक अनकहा सुकून था , जैसे बरसों का बोझ उतर गया हो, आज सबकुछ खूबसूरत लग रहा था | आज मेरी बेचें आत्मा को शान्ति मिली थी| आज मुझे उस प्रशन का जवाब मिल चूका था जो मैंने पिछली रात अपने खुदा से पूछा था “ की यह सब मेरे साथ ही क्यूँ हुआ “ | मेरे हर सवालो का जवाब मेरा मसीहा मुझे दे गया था | मेरे जिंदगी के हर दर्द, असफलताओं ने बस इसी उद्देश्य के लिए मुझे तयार किया, की मैं सही वक़्त पर सही इन्सान से मिलु| उस मसीहा की मोहब्बत को समझू | जीवन में हारा हुआ इंसान, आज पहली बार जीत कर घर लौटा था | कोई बड़ा युद्ध नही किया मैंने, मेरी जगह वो युद्ध कर गया | मौत नही सही मेने, मेरी जगह उसने अपनी कुर्बानी दी | आज एक लड़ाई को मैं जीत कर आया हूँ, जो बरसो से मुझे तोड़ रही थी |
अब कोई खौफ नही क्यूँ मेरा मसीहा मेरे लिए मेरे साथ हमेशा खड़ा है, अब डर नही रहा जिंदगी की परेशानियों का, वक़्त के उपर कार्य करने वाला मसीहा मुझे मिल गया है | एक अनजाना इन्सान, अनजाने वक़्त पर, अनजानी गलियों में मुझे मिला, उसने मेरे जीवन को सुकून से भर दिया| वो मेरे लिए ही इस दुनिया में आया, मेरे हर पापो का बोझ अपने कंधो पर उठा चला, मुझे मोहब्बत और मुआफी से भर कर, हमेशा के लिए उस सच्चे खुदा की गोद में बैठा दिया|
मैं बहुत खुशनसीब हूँ, की मुझे उस मसीहा का क्रूस उठाने का अवसर मिला, मुझे उसके दर्द को, उसकी महिमा को देखने के अवसर मिला| | एक अंजाने वक़्त पर एक अनजाना इंसान मुझे ज़िंदगी जीने की नई दिशा दे गया, एक नई परिभाषा दे गया, की में अपनी जिंदगी उसके लिए और उसमे जी सकूँ| यही मेरी जीवनी का वह पन्ना है, जिसने इस किताब को इतनी खूबसूरत और अर्थपूर्ण बना दिया। मुझे अब मरने की जरूरत नही है, मेरा मसीहा अपनी मोहब्बत के खातिर मेरे लिए कुर्बान हो गया| आज मैं जो भी हूँ, मेरे मसीहा की वजह से हूँ | और यही है मेरे जीवन का वो अध्याय जहाँ मैंने मेरे मसीहा की कुर्बानी में अपने अस्तित्व का अर्थ पाया और उसकी मोहब्बत में अपनी आत्मा का ठिकाना पाया | यह नया आगाज़ मेरी ज़िंदगी के सफर को दर्द से सुकून में, अंधेरे से ज्योति में, और बेअर्थ से अर्थपूर्णता में बदलने वाला सबसे खूबसूरत लम्हा साबित हुआ।
आखिर में एक गीत की पंक्तियों के साथ में अपने शब्दों को विराम देना चाहुगा:
“समुद्र भी गरजे और उठे तरंग,
तुफानो पर चलूँगा में तेरे संग,
पिता तू है राजा इन सब पर,
अब भय नही, जो तू है संग”
 

 


 

 


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