"फ़ज़ल-ए-राहत"

 

"फ़ज़ल-ए-राहत"

क्या मोहब्बत थी उसकी नज़रों में, जब उसकी नज़रें मेरी नज़रों से मिली थी,

क्या खूबसूरत था वो पल, जब उसकी बाहों ने मुझे अपने में समां लिया था,

क्या कहूँ उस वक़्त के लिए जब उसकी रूह का मस्सा मुझ पर उतरा था,

क्या ही बात रही होगी जो उसकी मोहब्बत ने मुझे अपनी और खिंच लिया था,

भटकते मुसाफिरों को मंजिल की प्यास थी, अंधेरों में काफिलों को ज्योति की आस थी,

मुरझाएं दिलों को अपनेपन की जरुरत थी, सचमुच दुनिया को एक मसीहा की तलाश थी,

सांकलों से जकड़ा मैं, पाप के सागर में था, हैवानियत का रूप मैं, मौत के करीब था,

अंधेरों में था मैं पड़ा, राज झूठ के सरताज का, कर दिया उसने खोखला, हर पाप का वो बाप था,

न आस थी, न रौशनी, अब गहराइयों में वास था, खुद की इन ख़ताओं से, मैं अंधेरों का अब दास था,

हर दर्द की अस्वस्था में, अब बस एक ही पुकार थी, रौशनी की आस थी, और खुद को निसार था,

पुकार का जवाब है, वो मोहब्बत का सार है, गहराइयों में हाथ उसका, रहमत जो आपार है,

दर्द का हकदार मैं, दर्द उसकी हालात थी, मौत का हकदार मैं, कुर्बान उसकी जान थी,

पाप के अँधेरे में, खोया जो इंसान था, सह गया दर्द उनके, वो मसीहा जो महान था,

मेरे लिए त्याग दिया सब, वो रहमत का भंडार था, उसकी मोहब्बत में छिपा, हर दर्द का इज़हार था,

वो हर गुनाह को धोने वाला, सच्चा एक उपकार था, मेरे लिए सही वक़्त पर, खुदा का वो उपहार था,

काँटों से सजा था सर, लहू से सना हर अंग था, वो दर्द में भी चुप था, यह मोहब्बत की पहचान था,

नंगे पैर चला है वो, चुभते थे ये पत्थर सारे, हर दर्द की दवा बना बहते लहू के क़तर सारे,

हर कदमों के निशान में रक्त की लकीरे थीं, हर रक्त की लकीरों में, मोहब्बत के दरीरे थे,

मोहब्बत भरे बाहों ने समां लिया मुझे अपने में, हर दर्द, हर ग़म, अब रहा गया जो सपने में,

नज़रें उस प्यार की दिल को सुकून सा दे गईं, तेरी कुरबानी खातिर मेरे, नई ज़िंदगी जो दे गईं,

गुप्त थी जों बातें, लबों पर खुल चुकी थी, ख्वाबों की बातें हकीकत से जो जुड़ चुकी थी,

आंसुओ को अब मुस्कान का साथ मिला था, मुफ़्ताह की नज़रें अब राहीमगार की ओर जो मुड़ चुकी थी,

भय नहीं जो, मौत के सायों से अब उठ चुका हूँ मैं कहीं, गहराइयों के गोते खा, आसमानों में उड़ चुका हूँ मैं कहीं,

साथ मेरे वो आज है, उसका सर्वदा का राज है, हर सांस में बसा है जो, उसके प्रेम का एहसास है,

बुझ गया था दीप जो, अब वही कहीं प्रकाश है, रहमत भरी यह ज़िंदगी, अब अनंत घर का वास है,

क्या ही बात रही होगी जो उसकी मोहब्बत ने मुझे अपनी और खिंच लिया था,

क्या कहूँ उस वक़्त के लिए जब उसकी रूह का मस्सा मुझ पर उतरा था

क्या खूबसूरत था वो पल, जब उसकी बाहों ने मुझे अपने में समां लिया था,

क्या मोहब्बत थी उसकी नज़रों में, जब उसकी नज़रों ने मेरी नज़रों को अपने में समेट लिया था

जब उसकी नज़रों ने मेरी नज़रों को अपने में समेट लिया था............

 

 

 

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