"शब्दों की महफ़िल"
एक कमरा, एक तरफ़ किताबों का शहर,
एक मेज़, कुछ बिखरे पन्नों का ढेर।
मन की कल्पनाओं को शब्द देना है,
दिमाग़ के शब्दों को दिशा देनी है,
दिशा को रास्ते देना है, रास्तों को मंज़िल देनी है।
कुछ थमा नहीं है, वक्त दौड़ रहा है...
एक शांत सा माहौल है,
घड़ी की हर पुकार वक्त के बहाव को समझा रही है।
मैं और एकांत...
आपस में वार्तालाप कर रहे हैं,
कुछ मैं कहता, कुछ वो,
कुछ मैं सुनता, कुछ वो।
कभी किताबों के पन्ने पलटता,
कभी यादों में कहीं खो जाता,
फिर लौट आता कुछ शब्दों के साथ,
कुछ एहसासों के साथ, कुछ मन की तन्हाइयों के साथ।
कभी कुछ लिखता, कभी कुछ कहता,
बस यूँ ही बेतरतीब ज़िंदगी गुज़रता।
शांत सा एक वक्त यहाँ समा है,
कुछ ऐसा ही मेरा जहाँ बना है।
Comments
Post a Comment