“बर-अब्बा”

 

आज फिर वो दिन लौट आया है, जिसे मैं कभी भुलाना नही चाहता हूँ | कमरे के एक कौने में अकेला बैठा हूँ, चारो तरफ सन्नाटा पसरा है, दीवार पर लटकी घड़ी की टिक-टिक अब भी जरुर चल रही थी, लेकिन उम्र की दहलीज़ को पार करके अब जीवन की संध्या में आ चूका हूँ | न जाने कब इस दुनिया से विदा ले लूँ – कोई ठिकाना नहीं है, बस कुछ ही साँसों की मोहलत बची है शायद | बस यही सोच कर आज मन में विचार आया है – क्यूँ न जाने से पहले, अपनी जिंदगी का एक महतवपूर्ण अध्याय कागज़ पर छोड़ जाऊं ? शब्दों में लिपटी हुई मेरी जिंदगी का एक ऐसा वक़्त जो कहीं न कहीं, किसी न किसी के दिल को आज जरुर छू जायेगी..... यह कहानी कोई भारी चमक-धमक से भरी नहीं है, न ही इसमें किसी युद्ध की गूंज है। यह तो बस एक मोहब्बत की कहानी है — खामोश, गहरी, और वक्त के साथ परिपक्व होती हुई। एक ऐसी मोहब्बत, जो शायद शब्दों में पूरी तरह बयाँ नहीं की जा सकती, पर हर अहसास में जिंदा रहती है | मैं जानता हूँ, मैं हमेशा के लिए नहीं हूँ, लेकिन ये मोहब्बत, हमेशा के लिए कायम रहेंगी। अगर कोई इसे पढ़े, तो मेरी एक विनती है — इसे पढ़ने से पहले एक पल ठहर जाइए। सोच-समझ कर, दिल से इसको समझिए। क्योंकि जब आप इसको पढ़ने के बाद उठेंगे, तो बस इस उम्मीद के साथ उठिए कि आपके भीतर एक नया दृष्टिकोण, एक नया अंदाज़, और एक नया निर्णय होगा।

खुश हूँ, क्योंकि ज़िंदगी में मैंने उसे पा लिया था। इस छोटी सी ज़िंदगी को, मैंने सिर्फ और सिर्फ उसके लिए जी लिया था। यही तो असली खुशी थी — उस मोहब्बत में खो जाना, जिसमें पूरी दुनिया से अलग एक ऐसा संसार बसाया जा सकता था, जिसमें सिर्फ वो और मैं है | मोहब्बत सिर्फ मुझसे नहीं हुई थी, मोहब्बत तो सभी से हुई थी। बस, पहचान की कमी थी शायद, जो मुझे समय रहते महसूस हो गई। अगर ये समझ ना पाता, तो शायद आज मैं भी उस राह पर चलता, जहाँ से मैं कभी लौट नहीं पाता — शायद मैं भी आज पाप का पुत्र होता।

मुझे याद है, आज ही के दिन सालों पहले, मैं एक हत्या के अपराध के तहत बंदीग्रह में था। वो एक अंधेरी कोठरी थी, जहाँ की दीवारें सीलन से भरी हुई थीं, और हवा इतनी घुटन भरी थी कि इंसान सूरज की रौशनी को भूल जाए। मैं बस उस अंधेरे में जी रहा था। आदत हो गई थी अब तो, उन कीड़ों-मकोड़ों के साथ, अंधेरे में ही अपनी ज़िंदगी जीने की। सजा हो चुकी थी मुझे — मृत्यु की। लेकिन, वक्त था अभी, तारीख नहीं आई थी। फिर भी, मुझे ये यकीन था कि एक दिन, वो तारीख जरूर आएगी, जब सजा ए मौत मेरे लिए दस्तक देगी। और उस दिन, जब वो आएगी, तो मैं खुद को तैयार कर चुका होगा, क्योंकि मैंने उस अंधेरे में खुद को खत्म कर लिया था।

मुझे याद नहीं है, मेरा जन्म कहाँ हुआ, कब हुआ, या मेरे माता-पिता कौन थे। वरना, मैं आपको जरूर बताता। मुझे बस इतना पता है, मेरा पालन-पोषण रोमियों के अत्याचारों और यहूदियों के ग़ुस्से के बीच हुआ। बचपन की वो तस्वीरें आज भी मेरे दिल में ताजा हैं, जब रोमी सैनिक हमारे घरों में घुस आते थे, हमें पीटते थे, हमारा पैसा छीन लेते थे, और सिर्फ दर्द ही छोड़ जाते थे। मेरा बचपन इन सभी लम्हों को देखते हुए ही बीता। हर सुबह जब उठता था, तो वही खौफ, वही डर था, जैसे हर कदम में कोई और ग़म छिपा हो। यहूदियों को अपने मसीह का इंतजार था, वो दिन रात यह उम्मीद लगाकर बैठे थे कि कोई आएगा, जो उन्हें इस कष्टपूर्ण जीवन से बाहर निकालेगा, जो उन्हें उन रोमियों के अत्याचारों से मुक्त करेगा। लेकिन वह मसीह अभी तक नहीं आया था। हर दिन वही घिनौना दृश्य सामने आता है — रोमी सैनिक, उनके बूटों की आवाजें, और उनकी बदहाली। हर दिन वो दर्द था, वो बंधन थे, जो उन्हें टूटने नहीं देते थे, और फिर भी वे इंतजार कर रहे थे |

समय के साथ, अपने चारों ओर की परिस्थितियों को देखते हुए, मैं भी एक ज्वालामुखी बन गया — जो बार-बार फटता था, रोमी साम्राज्य के खून और नफरत के साथ। मैंने चाहा कि मैं यहूदियों को रोमी साम्राज्य के अत्याचारों से आज़ाद करवा सकूँ। मैंने विद्रोह किया, तलवार उठाई, और रोमी सैनिकों का खून बहाया। कुछ ने मुझे नायक कहा, कुछ ने हत्यारा। लेकिन क्या कहूं, सच तो यह है — मैं न कोई नायक था, न मसीहा। मैं बस एक टूटा हुआ इंसान था, जिसे सिर्फ एक ही चीज़ आती थी — लड़ना। लड़ाई, जो मेरे अंदर की उस आक्रोश की प्रतिक्रिया थी, जो वर्षों से दबी हुई थी। मेरा सपना सिर्फ यही था — आज़ादी, जो मुझे कभी नहीं मिली, और जिंदगी, जो उस दमन से बाहर किसी भी कीमत पर जीनी थी।

आप सोच रहे होंगे कि मैं एक अच्छा इंसान हूँ... रुकिए, इतनी जल्दी मत कीजिए मुझे परखने में। माना, यहूदियों की नज़रों में मैं एक स्वतंत्रता सेनानी था, और रोमियों की नज़रों में एक खूंखार हत्यारा — लोग मुझे बस इसी पहचान से जानते हैं। लेकिन एक चेहरा और भी था मेरा, जिसे बहुत कम लोगों ने देखा, और शायद जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया। वो चेहरा, जो आईने में देखना अब भी भारी पड़ता है मुझ पर। उन दिनों शहर में लूटपाट की घटनाएँ बढ़ गई थीं। मुसाफिर — जो ऊँटों और गधों पर अपने बहुमूल्य सामानों के साथ सफर करते थे — अधरास्ते नंगे छोड़े जाते थे। सिर्फ कपड़े क्या, उनके सपने तक छीन लिए जाते थे। किसी का सोना गया, किसी की उम्मीदें, और किसी की सांसें तक। शहर के कोनों में एक भय घुल चुका था — जैसे हर परछाईं किसी लुटेरे की हो, और हर ख़ामोशी के पीछे एक चीख़ छिपी हो। और आज झूठ नही बोलूँगा साहेब! यह एक सत्य है मेरी जिंदगी का  उन लूटपाट की घटनाओं के पीछे भी... मैं ही था। हाँ, वही मैं — जिसे कभी नायक कहा गया, कभी बाग़ी, और कभी लोगों ने मसीहा समझ लिया — वही मैं, कई बार उस खौफ का नाम बन गया, जिससे लोग काँपते थे। मेरी तलवार सिर्फ अत्याचारियों पर नहीं चली थी... कभी-कभी वो मासूमों पर भी चली। कभी पेट की आग ने मजबूर किया, कभी हालात ने, और कभी उस अंधी लड़ाई ने जिसमें अपने-पराए का फ़र्क मिट चुका था। कभी-कभी सोचता हूँ — क्या मैं किसी और की आज़ादी के लिए लड़ रहा था, या बस अपने भीतर पल रहे शैतान को जिंदा रखने की वजह ढूंढ रहा था?"

ख़ैर... सत्य कब तक छुपा रहता है? चोर चाहे जितना भी शातिर हो, कोई न कोई सुराग छोड़ ही देता है। आख़िरकार, रोमियों ने मुझे पकड़ ही लिया। और फिर... क्या बताऊँ — बहुत मारा यार...  और फिर, मुझे फेंक दिया गया एक अंधेरी सीलन भरी कोठरी में, जहाँ न रौशनी थी, न उम्मीद। बस थी तो दीवारों पर छिपकियों की परछाईं और उस सूली की परछाईं — जो मेरा इंतज़ार कर रही थी। उस बंदीगृह के छोटे-छोटे जंग लगे झरोखों से मुझे दूर पहाड़ी पर वह सूली दिखती थी। मानो मेरे इंतज़ार में मुझे पुकारे जा रही हो |  मैं अक्सर उस दृश्य को देखता और सोचता, यार सच में कांप जाता था, रोता था की आख़िर क्यों किया मैंने ये सब?
क्यों बना मैं वो जो आज हूँ? हाँ, मैं पापी हूँ। मैं ख़ूनी हूँ। मैं डाकू हूँ। और अब, मेरी मौत तय है। मेरा नाम उस लकड़ी के तख़्त पर लिखा जा चुका है, जहाँ कीलें किसी बेगुनाह के नहीं, बल्कि मेरे जैसे गुनहगार की तलाश में थीं। मैं अब बस दिन गिन रहा हूँ... बस एक तारीख तय होनी बाकी है।" दिन यूँ ही गुजरते चले जा रहे थे |

एक दिन सुबह मैंने सुना सिपाहियों को कुछ अजीब सी बाते करते हुए, हाँ एक आदमी की चर्चा थी शायद, कोई नासरत का यीशु। कोई भविष्यवक्ता, कोई चमत्कारी। लोग कहते थे, वह अंधों को दृष्टि देता है, मुर्दों को जिलाता है। मैं हँसा — “एक और पागल संत।” आपको एक बात बताऊ ये संत लोग बड़े फ़ालतू होते हैं... न धन, न सामान, न हथियार — बस चिथड़े ओढ़े हुए, और मुट्ठी भर बातें। मेरे लूट के अनुभवों में भी एक बार मैंने ऐसे ही संत जैसे लोगों के एक झुंड पर धावा बोला था। लगा था कुछ मिलेगा — लेकिन क्या निकला? सिर्फ एक दो बटुए में कुछ सिक्के और एक रोटी। कौन था वो? कहाँ से आया था? पता नहीं... तब से ही मैंने ठान लिया था — संतों से दूर ही रहना है। ना उनका रास्ता समझ आता था, ना उनके शब्द.... खेर, अपन को क्या करना है इन सब से, हम तो बंदीगृह के निवासी है, दरवाजा खुलने का इंतज़ार है, जब से आया हूँ, कभी दरवाजा नही खुला, मतलब तारीख नही आई |

लेकिन अगले ही दिन, बाहर कुछ अजीब हो रहा था। बहुत शोर था... अलग-सा... कुछ नया|  लग रहा था जैसे किसी बड़े अपराधी की तारीख आ गई हो। कोई फाँसी या सूली का दिन था शायद... मगर किसका, यह साफ़ नहीं था। पर जो बाहर हो रहा था — वो आम नहीं था। लोगों की आवाज़ें जेल की मोटी दीवारों को चीरती मेरे कानों तक आ रही थीं। कोई हँस रहा था, कोई रो रहा था। कहीं धक्का-मुक्की हो रही थी, तो कहीं कोई चिल्ला रहा था — 'उसे छोड़ दो!' 'उसे क्रूस दो!' 'बचाओ!' 'मारो!' हर आवाज़ जैसे अलग कहानी कह रही थी... और भीड़ की सनक हर पल बढ़ती जा रही थी। मैं अंधेरे कोने में बैठा सोचता रहा — किसका होगा ये दिन...? किसकी तारीख है आज? कौन होगा यह अपराधी? क्यूँ लोग इतना चिल्ला रहे है ? क्या कहीं मेरी ही तारीख नही आ पहुँची है...?" इन्ही कई सवालो के मध्य से में गुजर रहा था की तभी... भीड़ के उस शोर के बीच किसी ने अचानक मेरा नाम पुकारा। हाँ, वो मेरा नाम। इतनी आवाज़ों के बीच भी वो पुकार मेरे कानों तक साफ़ आई — धीरे-धीरे और भी लोग मेरे नाम को दोहराने लगे। झूठ नहीं बोलूँगा साहेब — मैंने ज़िंदगी भर तलवार से खेला, मौत से आँख मिलाई, कभी डर नही लगा मुझे, लेकिन उस दिन... उस दिन दिल काँप उठा था। बेचैनी ऐसी कि साँस लेना मुश्किल हो गया। हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं, और आँखों में आँसू भरने लगे थे — बिना किसी शर्म के, खुद-ब-खुद। मैं अंदर से थरथरा रहा था, सच कहूँ तो — सिर से पाँव तक कांप रहा था। मैंने कभी पछतावे को महसूस नहीं किया था... पर उस पल... बस एक ही ख्याल बार-बार आ रहा था — 'काश... काश ये सब न किया होता, काश मैं कोई और होता...'

और तभी... दरवाज़ा खुला। दो सिपाही बंदीगृह में दाखिल हुए। उम्मीद क्या होती है? क्या है उम्मीद? क्या पता, शायद मुझे कभी इसका मतलब ही नहीं समझ आया। वो तो अब खत्म हो चुकी थी... कहीं खो गई थी, जैसे हवा में मिल गई हो। बस खामोश, एकदम शांत, मैं उन्हें देख रहा था। डर मेरे अंदर समा चुका था, जैसे हर अंग धीरे-धीरे जमता जा रहा हो। मौत मेरे सामने खड़ी थी, मेरी तरफ़ देख रही थी, जैसे कुछ पल और मेरी परीक्षा ले रही हो। आँखों में न कोई रोशनी थी, न कोई उम्मीद। मुझे ऐसा लगने लगा था, जैसे कुछ और क्षण मिलते तो... शायद मैं खुद को फिर से बदल सकता था। अफ़सोस... अफ़सोस कि अब एक और मौका नहीं मिलेगा, वो मौका जो हमेशा जीवन में मिलता है — कि हम अपनी गलतियों को सुधार लें, लेकिन अब नही मिलेगा, यह शोर मेरा ही था, यह तारीख मेरी ही थी, मृत्यु ने आखिरकार दस्तक देदी थी |

अगला पल मेरी सोच से परे था। आपको पता है, सिपाही ने मुझसे क्या कहा? जा! आज से तू आज़ाद है!’ मैंने चौंक कर पूछा, 'क्यूँ? क्या मेरी तारीख आज नहीं थी?' सिपाही ने बिना किसी भावनात्मकता के कहा, यह जो शोर तुझे बाहर सुनाई दे रहा है, उसने तुझे चुना है, अब जो शोर है न, वो दुसरे को मारने का शोर है |  मैं बस खड़ा था, समझ नहीं पा रहा था कि ये क्या हो रहा है। यह समझौता किस तरह का था? मैं लडखड़ाते हुए बाहर निकलता हूँ, बरसों बाद पहली बार मुझे अपनी आँखों में रौशनी नज़र आई थी। बरसों बाद, मैं अंधेरे से बाहर आया था, जहाँ हर चीज़ साफ़ दिखाई दे रही थी, लेकिन मुझे ये एहसास हो रहा था कि मेरी दुनिया अब भी उलझी हुई है। क्यूंकि लोग मुझे देख रहे थे, लेकिन कोई भी मुझे नफरत से नहीं देख रहा था। क्यों? क्या हो रहा था? मैं तो पापी था, मैं तो हत्यारा था, किसने मुझे माफ़ किया? क्यों मुझे कोई घृणा नहीं कर रहा था? और यह दूसरा कौन था, जिसके बारे में वो शोर था, जो क्रूस पर चढ़ने के लिए बुलाया जा रहा था?" प्रश्नों का समुंदर उफान भरने लगा था, हर सवाल जैसे एक नई लहर बनकर मुझ पर टूट रहा था। उत्तर रूपी किनारे की तलाश थी मुझे, लेकिन उन लहरों में खो जाने का डर भी था। हर विचार, हर नज़ारे मुझे और भी उलझाते रहे तब तक जब तक मैंने दुसरे इन्सान को नही देखा |

मैंने देखा — खून से लथपथ एक इंसान को। बेड़ियों से जकड़ा हुआ, एकदम खामोश... भीड़ के बीच बिल्कुल अकेला खड़ा था वो। (समझिएगा दृश्य को) उसकी पीठ मेरी ओर थी — मैं उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था, मैं कुछ समझ नहीं पाया, बस उस ओर खिंचा चला गया… धीरे-धीरे, उसके करीब… उसकी पीठ पर गहरे ज़ख्म दिख रहे है मुझे, , मैं उसके करीब आकर उसके पास से गुजरता हूँ और उसके सामने आकर खड़ा हो जाता हूँ | उसकी नज़रें मेरी नज़रों से मिलती है और.......मैं सन्न रह जाता हूँ, भीड़ का शोर एकदम ख़ामोशी में बदल गया। जैसे सारा संसार रुक गया हो उस पल के लिए। मेरी साँसें अटक गईं…  'यह चेहरा… यह नज़र…..

हाँ... मैं पहचान गया था उसे।" वो वही था — वही एकमात्र संत जिसे कभी लूटने की कोशिश की थी मैंने। याद है मुझे वो दिन, जब मैंने और मेरे साथियों ने उसके एक छोटे से झुंड पर धावा बोला था। सब कुछ छीन लेना चाहते थे, लेकिन उसके पास कुछ था ही नहीं... और फिर भी, न जाने क्यों, उसका चेहरा अब भी मेरी यादों में बसा हुआ था।

मैंने उस पर कई बार पत्थर फेंके थे। कोई कारण नहीं था, बस ग़ुस्से में, नफ़रत में, शायद इसलिए कि वो शांत था, और मैं अंदर ही अंदर तूफान। लेकिन हर बार वो चुप रहा, उस दिन भी और आज भी। आज खून से लथपथ, टूटा बिखरा वो, उसकी आँखों में मेरे लिए कोई नफरत नही थी, कोई शिकायत नही थी |

यार, आज मुझे उस स्थान पर होना था जहाँ वो है, मैं ही था पापी जिसे क्रूस पर चढ़ना था, मेरी जगह थी सूली पर आज, मेरे हाथो में कीले लगनी थी, मुझे नफरत किया जाना चाहिए था, पर आज मुझे आज़ाद कर दिया गया है और मेरी जगह उसने ले ली, उसने न पाप किया था, दर्द सह कर भी खामोश खड़ा था वो,  लोग उस पर थूक रहे थे, उसे गालियाँ दे रहे थे। वो हर चोट, हर तिरस्कार को सह रहा था... चुपचाप। क्यों? मैंने उसके लिए क्या किया था? कुछ भी नहीं... सिवाय घृणा के, लूट के |

सवाल अब भी थे मेरे मन में — ढेर सारे, उलझे हुए, बेकाबू। क्यों मुझे चुना गया? क्यों वो चुप रहा? क्यों उसने कुछ नहीं कहा अपने बचाव में? ये कौन था, जो मेरे लिए मरने जा रहा था? मेरे अंदर एक शोर मच रहा था, लेकिन बाहर... बाहर एक अजीब सी ख़ामोशी थी |

जवाब न किसी शब्द में मिला, न किसी चीख में... जवाब आया बस उसकी नज़रों से। वो नज़रें, जब मेरी नज़रों से मिली उनमें कोई शिकवा नहीं था, कोई इल्ज़ाम नहीं था। वहाँ सिर्फ़ एक भाव था — मोहब्बत।

उसने मुझे देखा, और मैं देखता रहा उसे। वो खून से लथपथ था, काँटों का ताज उसके सिर पर था, पीठ पर कोड़े के निशान थे, और हाथों में सूली की छाप — पर जब उसकी नज़रों ने मुझे देखा, तो ऐसा लगा जैसे हर ज़ख़्म से एक ही बात कह रहे हो — “सबकुछ सिर्फ तेरे लिए”  और फिर... फिर वो मुस्कुराया। वो पहचान चूका था की मैं कौन हूँ, वो मेरे दर्द सहने को तैयार था, और मैं आज़ाद | मैं स्तब्ध खड़ा था। उसके चेहरा... मेरे सारे सवालों का जवाब बन चुकी थी।

अब मुझे समझ आ चुका था — यह कोई साधारण मनुष्य नहीं था। यह वही था जिसका इंतज़ार इंसानियत ने सदियों से किया था, जिसके लिए भविष्यवक्ताओं ने आवाज़ उठाई थी, और जिसकी राह तकते-तकते लोगों की उम्मीदें पथरा गई थीं। यह वही था — मसीहा। मैंने एक स्वतंत्रता सेनानी बनकर यहूदियों को रोमियों की बेड़ियों से आज़ाद कराने की कोशिश की थी, लेकिन मेरे अंदर सिर्फ़ क्रोध था, बदले की आग थी। और उसने — उसने मोहब्बत से मुझे पाप की सच्ची बेड़ियों से छुड़ाया। उसने मुझे उस अंधेरे से निकाला जिसमें मैं खुद को पहचानना भी भूल चुका था — और ज्योति की ओर खींच लाया, जहाँ मैं पहली बार खुद को साफ देख पा रहा था। आज मेरे हाथों में बेड़ियाँ नहीं थीं — क्योंकि उसके हाथों ने उन्हें थाम लिया था। आज मेरे कंधों पर कोई बोझ नहीं था — क्योंकि क्रूस उसके कंधों पर रखा गया था। आज मेरा माथा शर्म से झुका नहीं था — क्योंकि कांटों का ताज उसके सिर पर था। आज मुझे कोई दर्द नहीं था — क्योंकि ज़ख्मों से बहता लहू उसका था। और आज मुझसे नफ़रत करती नज़रों की बौछार नहीं थी — क्योंकि वो सारी नफ़रत उसने अपने ऊपर ले ली थी। मैं आज़ाद था। पर उस आज़ादी की क़ीमत उसने चुकाई थी।

मैंने सारा जीवन यह सोचकर जिया था कि ताक़त बंदूक की नोक में है, आज़ादी तलवार की धार में है, और इज़्ज़त डर के साए में कमाई जाती है। लेकिन उस क्षण... जब मैंने उसे देखा — उस संत को, उस मसीहा को — जिसने कभी कोई गुनाह नहीं किया, फिर भी मेरे लिए सज़ा झेली... उस क्षण मुझे समझ आया, सच्ची ताक़त तो क्षमा में है। सच्ची क्रांति तो प्रेम में है।

मैं वही था जिसने पत्थर उठाए थे उसके खिलाफ — और वह वही था जिसने नज़रें उठाई थीं मुझे देखने को |  मैं वही था जिसने उसका अपमान किया था — और वह वही था जिसने मुझे आदर से देखा था। मैं वही था जो अंधेरे में छिपकर दूसरों का लहू बहाता था — और वह वही था जो ज्योति में आकर अपना लहू बहा गया... मेरे लिए। सच्ची आज़ादी तलवारों से नही प्राप्त हुई, लहू से प्राप्त हुई थी, उसका लहू मेरी तलवार से अधिक ताक़तवर था।

मुझे आज भी याद है... वो क्षण... वो दृश्य जैसे मेरी आत्मा पर अंकित हो गया हो। जितनी बार वह मसीहा उस भारी क्रूस के नीचे गिरता, उतनी ही बार मैं अपने भीतर का बोझ उतरता महसूस करता। वो लहू, जो उसके शरीर से बह रहा था, मानो एक-एक बूँद मेरे हृदय में उतरती जा रही थी —और मेरे पापों की कालिख को साफ़ करती जा रही हो, मुझे नया बना रहा हो। जब लोहे की कीलें उसकी हथेलियों को चीरती चली गईं, ऐसा लगा जैसे मेरे जड़ और पत्थर जैसे दिल को चीर कर कोई नया हृदय उग आया हो। वहाँ, उस सलीब पर — खून से भीगा हुआ, काँटों का ताज पहने — वो मसीहा… फिर भी शांत… फिर भी मोहब्बत से भरा… अपने बाँहें फैलाए जैसे मुझे ही बुला रहा था। उसके होंठों से निकले शब्द — हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं” अब मेरे लिए बस एक वाक्य नहीं थे। वे मेरे प्रश्नों का उत्तर बन चुके थे। उस सूली पर लटके इंसान में अब मैं कोई साधारण संत नहीं देख रहा था। वो मेरा उद्धारकर्ता था, वो मेरा मुक्तिदाता था — जो मेरे लिए मर रहा था, ताकि मैं सचमुच जी सकूँ। और आखिर उस क्रूस पर बड़े शब्द के साथ उसने अपनी आखिर सांस को छोड़कर अपने प्राण त्याग दिए लेकिन उसके अंतिम श्वांस ने मुझ में नयी श्वांस अर्थार्थ एक नयी जिंदगी फूंक दी | उसका मरना मेरी आत्मा का जन्म बन गया।

सच कहूँ दोस्तों, मैं उस मोहब्बत के लायक नहीं था। मैंने तो सिर्फ नफरत बोई थी — दुनिया के लिए भी, और उसके लिए भी। मैंने अपने हाथों से ज़ख़्म दिए, और अपने दिल में जहर पाला था। लेकिन जिसे मैंने पत्थरों से घायल किया, उसने मुझे अपने लहू से धो डाला। मैं लड़ता रहा — हक़ के नाम पर, बदले के नाम पर, पर कोई भी मेरी लड़ाई में मेरे लिए नहीं लड़ा। जिसके लिए लड़ा, वो तो मुझे भूल गए... लेकिन जिसने मुझे बचाया... वो वो था, जिसे मैंने कभी अपना समझा ही नहीं। मेरा मसीहा। वो जब मेरी ओर मुस्कुराया, तो मेरे भीतर कुछ टूट गया। वो मुस्कान मेरी अदालत बन गई, जहाँ मेरा हर गुनाह गिनाया नहीं गया... बल्कि माफ कर दिया गया। यार, सोचो तो सही... जिसे मैंने ठुकराया, उसी ने मुझे अपनाया। जिसे मैंने गिराया, उसी ने मुझे उठाया। जिसे मैंने चुप कराया, उसी ने मेरे लिए पुकार लगाई। और आज, उसी की वजह से... मैं आज़ाद हूँ। मैं जीवित हूँ। मैं नया बना हूँ।

दोस्तों, मैं आज कोई धर्मशास्त्री नहीं, कोई संत नहीं बना हूँ... पर अब मैं जान गया हूँ, मसीहा का मतलब क्या होता है। वो मुझे जानता था, फिर भी मुझे चुना। वो मुझे पहचानता था, फिर भी मुझे अपनाया। और अब अगर कोई मुझसे पूछे—"कौन था वो नासरत का यीशु?" तो मैं कहूँगा... नासरत का यीशु वो नही है जिसे मैं जानता था, जिसे मैं समझता था, नासरत का यीशु वो है जो मुझे जानता था, जो मुझे समझता था, और मुझे से मोहब्बत करता था |

दोस्तों, आज जब अब जब मेरी साँसें धीमी पड़ने लगी हैं, और जीवन का सूर्य धीरे-धीरे अस्त हो रहा है, तब भी मेरे भीतर एक उजाला है — वो उजाला जो उस दिन मेरे अंदर समा गया था, जब मैंने क्रूस की ओर देखा था। मेरी ज़िंदगी कोई उदाहरण नहीं थी, पर उस दिन से मेरी ज़िंदगी एक गवाही बन गई थी — उस मसीहा की, जिसने मुझे मेरी ही मृत्यु से बचाया।

मैं आज भी वही हूँ — एक साधारण इंसान। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि अब मैं अकेला नहीं हूँ। मेरे भीतर वो मोहब्बत बस चुकी है, जो कभी मैंने पहचानी नहीं थी — जो मेरी ओर देखती रही |  अब मैं जानता हूँ, कल मेरी मौत के साथ मेरा अस्तितत्व खत्म हो जायेया, मेरा नाम कुछ वक़्त में इतिहास से भी ओझल हो जाएगा, लेकिन मेरा नाम उस के दिल में दर्ज है, जिसने मेरी जगह अपनी जान दे दी। और उसकी मोहब्बत हमेशा हमेशा के लिए कायम रहेगी|

मुझे डर नहीं अब मृत्यु का — क्योंकि मैं पहले ही मर चुका था, और अब जो जीवन है, वह मेरा नहीं, उसका है जो मेरे लिए मरा।"मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ: अब मैं नहीं, पर मसीह मुझ में जीवित है..." गलातियों 2:20

और अगर आप ये कहानी पढ़ चुके हैं... तो मैं बस यही चाहूँगा कि आप रुकें, सोचें... और पूछें — क्या आप भी उस मोहब्बत को पहचानते हैं, जिसने मेरे जैसे को आज़ाद कर दिया? क्यो कि अगर आज आप उसकी ओर देखेंगे, तो शायद आपकी कहानी भी वहीं से शुरू होगी, जहाँ मेरी खत्म होती है।

अगर आप लोग मुझे पहचान गए तो अच्छा है, नहीं तो मैं बताता हूँ — मेरे नाम का अर्थ है "पिता का पुत्र"। सच कहूं तो, मैं केवल नाम का पुत्र था। न मैंने कभी अपने पिता को देखा था न पहचानता हूँ, , अपनी मर्ज़ी का मालिक था, पापो में खोया, लेकिन उस परमेश्वर ने अपने पुत्र की क़ुर्बानी दी, ताकि मैं सच में स्वर्गीय पिता का पुत्र कहलाऊं। मैंने अपना पूरा जीवन उस क़ुर्बानी से पहले, अपनी इच्छाओं और पापों में खोया था। लेकिन जिस दिन मुझे यह समझ में आया कि वो जो मुझसे नफ़रत करने वालों की भीड़ के बीच खड़ा था, वो मसीहा था — वही परमेश्वर का पुत्र था, जिसने खुद को मेरे स्थान पर सज़ा दी। वह जो निर्दोष था, उसने मेरी जगह पर पाप की सज़ा उठाई, ताकि मैं आज़ाद हो सकूं। और उसकी क़ुर्बानी ने मेरी पहचान बदल दी। उस दिन से मुझे यह समझ में आया कि सिर्फ नाम का पुत्र होना कुछ नहीं, असली पुत्र वही है जो अपने पिता की इच्छा को समझे और उस पर चले। मेरी नफ़रत, मेरी गलतियां, मेरे पाप — सब उसके बलिदान से धो दिए गए। वह प्रेम जो उसने मुझसे किया, वह मुझे पहचान देने के लिए था, ताकि मैं सच में स्वर्गीय पिता का पुत्र बन सकूं।

आज, मैं वही हूँ जो कभी नहीं था — पुत्र। पिता का पुत्र – अब मैं सिर्फ नाम का नहीं... अब मैं वास्तव में अपने स्वर्गीय पिता का पुत्र हूँ। "लेकिन जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया — अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं।" यूहन्ना 1:12 |

यही मेरी आखिरी गवाही तुम्हारे लिए लिख छोड़ जा रहा हूँ, संसार से विदा लेने का वक़्त मेरा आ चूका है, उसकी मोहब्बत हमेशा कायम रहेगी |  मैं था पिता का पुत्र अर्थार्थ “बर-अब्बा”

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