ज़िंदगी - एक डोर

 


ज़िंदगी - एक डोर


हवा सी चलती यह छोटी ज़िंदगी  

कभी इस दिशा तो कभी उस दिशा 

कभी इस छोर तो कभी उस छोर 

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर


जाने कभी हमारी नाराज़गी से रूठ कहाँ मुख मोड़ लेती है 

बचपन से बुढ़ापे की यह डोर जो जोड़ लेती है 

कभी तह तो कभी सतह पर लाकर हमे यह खडा करती है 

यूँ ही उतार चढ़ाव मे जाने कहाँ यह चढ़ा उतरा करती है 

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर


कहीं थमना तो कहीं चलते रहना

कहीं कहीं थोड़ा रुक सा जाना 

कहीं वही सहम जाना, वही कहीं मूक सा जाना

यह ही तो है  ज़िंदगी का खूबसूरत फसाना

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर


कभी नजदीकियां तो कभी फ़ासले है

कभी बूज़दिली तो कभी हौसले है

कभी शौक है तो कभी शान है 

ना जाने कैसी आन है 

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर है


कभी खुशी तो कभी गिले शिक्वो का असर

कभी जान तो कभी अंजान रास्तो का सफ़र

कभी दुश्मनो के काफिले 

तो कभी दोस्तो की महफिलों का शोर

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर है


कभी खुशनुमा पलो का एहसास 

कभी दुख से भरे एहसां

आखिर मे एक कठिन जवाब 

जिसका सिर्फ वही एक ही सवाल 

की हवा से गुजरती ज़िंदगी 

कभी इस छोर तो कभी उस छोर 

कभी दुख से तो कभी सुख से गुजरती एक डोर

ना जाने चलती किस ओर है

ना जाने आखिर चलती किस ओर है?? 











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