आज़ादी
आज़ादी
"मेरा अतीत पाप था, मेरा भविष्य परमेश्वर है।
By: आशीष जॉर्ज
प्रभु मुक्तेश्वर, गुरुदेव
यीशु के पावन नाम से आप सभी को मेरा विनम्र प्रणाम। आज मैं आपके समक्ष अपने जीवन
की उस पुस्तक के कुछ अनूठे पन्ने खोलने जा रहा हूँ, जो मेरे
अस्तित्व की जड़ों को मजबूत करती है, और जिनके अक्षरों में
मेरी पूरी जिंदगी की कहानी बसी है | यह एक ऐसी घटना है, जो
मेरे उतार-चढ़ाव से भरे जीवन में स्थिरता की शीतल बयार बनकर आई। यह न केवल एक
गवाही है, बल्कि एक चेतावनी भी, जो
आपको उन राहों से सतर्क कर सकती है जो हमें अंधकार की खाई में ढकेल देती हैं। मैं
आज आपको बताना चाहता हूँ, कि इंसान का जीवन नरक के योग्य
कैसे बनता है, और उस दुष्चक्र से बच निकलने का मार्ग क्या हो
सकता है। यह मेरी कहानी है, जो संसार की चमक-धमक में उलझ कर अपने
सच्चे उद्देश्य से भटक गई थी। मेरे कदम मुझे अंधकार की घाटियों में ले गए, जहाँ हर सपना बिखरा पड़ा था, और हर उम्मीद बुझ चुकी
थी। आज, मैं उन अनुभवों को आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। मेरे
शब्द केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि आपके हृदय तक पहुंचने के
लिए हैं। क्योंकि यदि यह कहानी किसी एक व्यक्ति के जीवन को नरक से बचाकर स्वर्ग की
ओर मोड़ सके, तो यह प्रयास सार्थक होगा |
मैं एक मसीही परिवार
में जन्मा, जहाँ मेरे जीवन की शुरुआत ही परमेश्वर के प्रेम और उनके
अनगिनत आशीर्वादों के बीच हुई। बचपन से ही मेरे माता-पिता की दुआओं ने मेरी परवरिश
को संजोया और सँवारा। उन्होंने मुझे यह सिखाया कि "हर
मर्ज़ की दवा है प्रार्थना और विश्वास।" मैंने, एक
आज्ञाकारी बच्चे की तरह, इन बातों को अपने जीवन का हिस्सा
बनाया। मेरे पिता हर रात सोने से पहले मुझे पवित्र वचन पढ़ाते थे। वे न केवल वचन
पढ़ाते, बल्कि उसे मुझे समझाते और याद भी करवाते थे। उनकी यह
आदत मेरे दिल में गहराई तक बैठ गई। मेरी माँ भी हमेशा इस बात का ध्यान रखती थीं कि
मैं सुबह उठने और रात सोने से पहले प्रार्थना करूँ। उनकी बातों में ऐसी मधुरता और
अनुशासन था कि मैं बिना किसी झिझक के उनकी सीख को मान लेता था। परमेश्वर की आराधना
मेरे जीवन का हिस्सा थी, और यह मेरे माता-पिता ने बचपन से ही
मेरे भीतर बो दिया था। एक और खास बात थी जो मुझे आज भी बहुत याद है। छोटे बच्चों
को सुलाने के लिए आमतौर पर माता-पिता उन्हें लोरियां सुनाते हैं। लेकिन मेरे
माता-पिता ने मेरे लिए कुछ अलग किया। वे मुझे सुलाने के लिए लोरियों की जगह परमेश्वर
के गीत गाते थे। वह गीत मेरी समझ से परे था, क्योंकि मैं
उसके बोल नहीं समझ पाता था। लेकिन उसकी धुन... वह धुन इतनी मधुर और शांतिमय थी कि
मुझे तुरंत अपनी ओर खींच लेती थी। सच कहूँ तो, वह मेरे बचपन
की सबसे प्यारी यादों में से एक है। वह गीत मेरे दिल को इतनी शांति देता था कि मैं
उसे सुनते-सुनते आराम से सो जाता था।
मेरा पूरा बचपन
प्रभु के मार्गदर्शन और उनकी पवित्रता में गुज़रा। हर दिन वचन पढ़ना, प्रार्थना करना और परमेश्वर के प्रति समर्पण मेरे जीवन का हिस्सा बन चुका
था। यह आदत नहीं, बल्कि मेरे जीवन का स्वाभाविक नियम बन गई
थी। वर्षों का पहिया धीरे-धीरे घूमता रहा। मेरे साथ मेरी पढ़ाई भी बढ़ती गई।
जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, पढ़ाई और अन्य कार्यों में
मेरी व्यस्तता बढ़ने लगी। मेरा ध्यान जीवन की नई जिम्मेदारियों और दुनियादारी की
ओर खिंचने लगा। दुनिया की समझ मुझमें धीरे-धीरे घर करने लगी थी। लेकिन इसी समझ ने, न जाने कब और कैसे, मुझे प्रभु के वचन से दूर कर
दिया। जिस पवित्रता में मेरा जीवन व्यतीत हो रहा था, उससे
अनजाने में ही मैं कदम दर कदम दूर होता गया। न जाने कैसी ग़लत आदतें मेरे स्वभाव
का हिस्सा बनती जा रही थीं, और अर्थहीन शब्द मेरे शब्दकोष
में समाहित होते जा रहे थे। वे न केवल मेरी भाषा में प्रकट होते बल्कि मेरी आदतों
में भी झलकने लगे थे।
हाँ! कभी-कभी मुझे वह
परमेश्वर याद आ जाता था, लेकिन वह भी केवल कुछ क्षणों के लिए। अधिकतर तो मैं दुनिया
की चकाचौंध में ही खोया रहता था, उसके प्रेम और मार्गदर्शन
से अनभिज्ञ, अपनी इच्छाओं और वासनाओं में उलझा हुआ।
फिर एक रात, जब
जीवन की कठिनाइयाँ मुझे घेर चुकी थीं, तब अनायास ही मेरे
हृदय में परमेश्वर की याद जाग उठी। संकट की उस घड़ी में, जब
कोई सहारा नहीं दिखा, तब मैंने उस परमेश्वर को पुकारा जिसे
मैंने जाने कब का भुला दिया था। मैं सच्चे हृदय से प्रार्थना करने लगा, और जैसे-जैसे मेरी आँखों से आँसू बहते गए, वैसे-वैसे
मेरा अंतर मन हल्का होने लगा।
तभी अचानक, मुझे
अपनी सारी भूलें स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगीं—वह हर कदम जो मुझे परमेश्वर से दूर
ले गया, वह हर आदत जो मेरे चरित्र को कलंकित करती गई,
और वह हर क्षण जब मैंने संसार को अपने प्रभु से अधिक महत्व दिया।
मुझे एहसास हुआ कि मैं केवल सुख-सुविधाओं और स्वार्थ की दौड़ में इतना आगे बढ़ गया
था कि अपने सृष्टिकर्ता को ही पीछे छोड़ दिया।
उसी क्षण, मैंने
प्रभु के चरणों में गिरकर सच्चे हृदय से पश्चाताप किया। मैं फूट-फूटकर रोया और
परमेश्वर से क्षमा माँगी, कि वह मुझे फिर से अपनी पवित्रता
में लौटा ले। मैंने निश्चय किया कि अब मैं पहले की तरह एक पवित्र जीवन जिऊँगा,
अब मैं संसार के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रभु
के लिए जिऊँगा। मैं अपने प्रभु के और निकट जाऊँगा, उसके वचन
का अध्ययन करूँगा और उसकी आज्ञाओं में चलूँगा।
एक
ऐसे बड़े संकल्प के साथ, मैंने प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में
स्वीकार किया, सच्चे मन से पश्चाताप किया और बपतिस्मा लिया।
वह क्षण मेरे जीवन का एक नया आरंभ था—एक नया जन्म, जिसमें
मेरा पुराना अस्तित्व समाप्त हो गया और मैं प्रभु की अनंत प्रेम भरी बाहों में लौट
आया।
लेकिन कुछ ही समय
बीता था कि मेरा अतीत एक अनचाही छाया की तरह मेरे पीछे चलने लगा। मैं उसे भुला
देना चाहता था, मिटा देना चाहता था, लेकिन वह एक
चलचित्र की भाँति मेरी आँखों के सामने बार-बार उभर आता। हर क्षण, हर याद, जैसे मुझे मेरी पुरानी ज़िंदगी में वापस
खींचने की कोशिश कर रही थी।
मुझे ऐसा लगता था
मानो कोई अनदेखा स्वर मुझे पुकार रहा हो, मुझे अपने पास बुला रहा हो—एक ऐसा
आकर्षण, जो धीरे-धीरे मेरी आत्मा को फिर से जकड़ने लगा। मैं
उससे दूर भागने की कोशिश करता, लेकिन मेरी सीमाएँ थीं। मैं
केवल एक हद तक ही उसका प्रतिरोध कर पा रहा था।
धीरे-धीरे मेरे अतीत
की परछाई मेरे वर्तमान पर असर डालने लगी। वे बीते हुए पल, जो
कभी खत्म हो चुके थे, अब मेरी सोच, मेरे
निर्णय और मेरे जीवन को प्रभावित करने लगे थे।
धीरे-धीरे मेरा मन
प्रार्थना और वचन से उचटने लगा। जो कभी आत्मा के लिए भोजन था, अब
मुझे बोझ लगने लगा। मेरा हृदय अब वह पहले जैसी प्यास महसूस नहीं करता था। मैं
दोस्तों के साथ समय बिताने, घर से बाहर रहने, दुनियावी कामों में उलझने और मोबाइल में डूबे रहने लगा। धीरे-धीरे इन सब
चीज़ों ने मुझे इस कदर व्यस्त कर दिया कि मैं यह भी भूल बैठा कि मैंने प्रभु के
सामने एक पवित्र संकल्प लिया था।
वह संकल्प जो कभी
मेरे जीवन का केंद्र था, अब एक धुंधली याद बनकर रह गया। मेरी आत्मा में अब वह
उत्साह नहीं था, वह जोश नहीं था, जो
प्रभु की उपस्थिति में होने से मिला करता था। मैं धीरे-धीरे प्रभु से दूर होने
लगा—न प्रार्थना के लिए समय था, न वचन पढ़ने की चाह। मेरा मन
अब संसार की चकाचौंध में अधिक सुकून खोजने लगा, जबकि मेरे
भीतर एक सूना खालीपन पनपने लगा था।
अब मेरे शब्दों और
मेरी बात करने के लहज़े में एक नया परिवर्तन आने लगा था, जिससे
मैं बिल्कुल अनजान था। मेरी वाणी में वह कोमलता, वह पवित्रता
धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही थी, और इसकी जगह एक कठोरता,
एक दुनियावी रंग ने ले ली थी। न जाने कैसे, मेरे
भीतर पाप करने की ऐसी तड़प जाग उठी थी, मानो कोई अदृश्य
शक्ति मुझे अंधकार की ओर खींच रही हो। वह तड़प इतनी प्रबल थी कि मैं उसे रोकना
चाहता था, लेकिन मैं असहाय महसूस कर रहा था। यह एक अनजाना
आकर्षण था, जो मुझे बार-बार अपनी ओर बुला रहा था।
वही पिछली आदतें, जिन्हें
मैंने कभी प्रभु के प्रेम में छोड़ दिया था, अब एक नए रूप और
नए चेहरे के साथ मुझमें प्रवेश करने लगी थीं। वे पहले से कहीं अधिक आकर्षक,
कहीं अधिक शक्तिशाली लग रही थीं, मानो मेरे
हृदय पर उनका पहले से ही अधिकार हो। आप मानेंगे नहीं, लेकिन
मैंने फिर से गाली-गलोच और अशुद्ध शब्दों के माध्यम से पाप की ओर पहला कदम बढ़ा
दिया था।
मुझे मेरे चारों तरफ
दुनिया अपनी बाँहें फैलाए बुलाती नज़र आ रही थी—चमकदार, मोहक,
और बेहद लुभावनी। मैं भी धीरे-धीरे उस ओर खिंचने लगा। उस क्रूस पर
फैली प्रेम भरी बाँहों को मैं भूल चुका था। और मैं… मैं अपने ही पैरों से उस
दुनिया की ओर बढ़ने लगा, जहाँ पाप मेरा इंतज़ार कर रहा था।
लेकिन इस बार कुछ अलग
था। इस बार मेरा पतन पहले से कहीं अधिक गहरा और अंधकारमय था। अब मुझे सिगार, शराब,
और न जाने कितने तरह के नशे होने लगे थे। लेकिन सबसे खतरनाक नशा तो वह
था, जो मेरी आत्मा को मार रहा था—पाप करने का नशा। हाँ,
अब मुझे पाप करने में मज़ा आने लगा था। मेरी आत्मा जो कभी छोटी-सी
गलती पर भी काँप उठती थी, अब पूरी तरह सुन्न हो चुकी थी।
मेरी हालत दिन-ब-दिन
बिगड़ती जा रही थी। अब मैं वह इंसान नहीं था, जिसे कभी प्रभु ने अपने प्रेम से
सँवारा था। मैं लोगों के साथ मारपीट करने लगा, चोरी करने लगा,
यहाँ तक कि प्रभु के भक्तों को सताने में भी मुझे कोई झिझक नहीं थी।
मेरे भीतर अब कोई संवेदना नहीं बची थी, कोई पछतावा नहीं था।
पाप मेरे लिए अब बोझ नहीं, बल्कि आनंद बन चुका था।
दोस्तों, मैं
सच कहता हूँ—मेरा हाथ अब मेरे माँ-बाप तक पर उठने लगा था। जिनके प्यार ने मुझे
पाला था, जिनकी दुआओं ने मुझे बचपन से संभाला था, उन्हीं की आँखों में अब मेरे लिए आँसू और डर के अलावा कुछ नहीं था। मेरे
अपने ही मुझसे डरने लगे थे, मुझसे परेशान रहने लगे थे।
रातों को मैं
बैठा-बैठा चिल्लाता रहता, चीखता, रोता—लेकिन मुझे खुद नहीं पता
था कि मैं किससे लड़ रहा था, किससे भाग रहा था। दिन में मैं
एकदम खामोश पड़ा रहता, खाली, बुझा-बुझा,
जैसे भीतर से कुछ मर चुका हो। हर दिन मेरे मोहल्ले में मेरी शिकायते
आने लगी थी, सब पपरेशान थे मेरे इस नया व्यहवार से |
और फिर, वह
दिन आ गया जब मुझे मेरे ही घर से निकाल दिया गया। अब मेरे लिए कोई दरवाजा नहीं
खुला था, कोई जगह नहीं बची थी जहाँ मैं लौट सकता था। मैं
पूरी तरह अकेला था—एक ऐसी भयानक तनहाई में घिरा, जहाँ कोई
सहारा नहीं था, कोई उम्मीद नहीं थी।
अब मेरी ज़िंदगी पूरी
तरह से नरक बन चुकी थी। मैं उस जगह पर पहुँच चुका था, जहाँ
से लौटना नामुमकिन लगता था।
अपनी मानसिक
व्याधियों और दुष्ट आत्माओं से जकड़ा हुआ, भूख और प्यास से बेहाल, मैं एक कमजोर, निर्बल और टूट चुका युवक, आज न जाने किन घोर अंधकारमय, सुनसान गलियों में भटक
रहा था। हर कदम के साथ मेरे भीतर की खालीपन और गहराता जा रहा था। न कोई सहारा था,
न कोई हाथ पकड़ने वाला। मैं पूरी तरह से अकेला था—एक भटकी हुई आत्मा,
जिसे उसके अपनों ने त्याग दिया था।
जिस घर की दहलीज पर
मैं कभी निश्चिंत होकर खेलता था, जिसकी छत के नीचे मैंने सुरक्षा महसूस की थी, वह अब मेरे लिए एक सपना बन चुका था। अब वहाँ मेरे लिए कोई जगह नहीं थी।
मैंने खुद ही अपने रिश्तों को आग लगा दी थी, और अब मेरी
दुनिया राख बनकर मेरे सामने बिखरी हुई थी।
मैं जानकर कुछ भी
नहीं कर रहा था—बस शैतान के कब्जे में था और अफ़सोस... कोई मुझे समझने वाला नही था
|
मैं ऐसे ही बड़े-बड़े
शैतानी बंधनों में बंधता चला गया। हर दिन, हर क्षण, उन
जंजीरों की पकड़ और मजबूत होती गई, और मैं धीरे-धीरे अपनी
आखिरी बची हुई स्वतंत्रता भी खोता चला गया। शैतान अब मेरी आत्मा का स्वामी बन चुका
था। वह मुझसे जो चाहता, मैं वही करता। उसने मुझे अपने हाथों
की कठपुतली बना लिया था, और मैं—मैं उसकी इच्छाओं को पूरा
करके उसे खुश करता गया, जैसे मेरी अपनी कोई सोच, कोई इच्छा ही न रही हो।
मेरी आत्मा एक ऐसी
अंधेरी जेल में कैद हो गई थी, जहाँ से छूटना नामुमकिन लग रहा था। मेरा विवेक मर चुका था,
मेरी आत्मा कराह रही थी, लेकिन मैं सुन नहीं
पा रहा था। मैंने इतने पाप कर लिए थे कि अब मैं खुद को इंसान भी नहीं समझ पा रहा
था।
मैं आज ऐसी परिस्थिति
में पहुँच चुका था, जहाँ से आज़ाद होना बहुत मुश्किल था। हर ओर बस अंधकार था—गहरा,
ठंडा, डरावना अंधकार।
मेरा घर अब
रास्तों पर था—उन सुनसान गलियों में, जहाँ मेरे अलावा बस
आवारा जानवर थे, जिनका कोई ठिकाना नहीं था, कोई पहचान नहीं थी। मैं उन्हीं के साथ रहता, उन्हीं
की तरह सोता, उन्हीं की तरह खाने के लिए भटकता। मेरी दाढ़ी
और मूँछें इतनी बढ़ चुकी थीं कि मेरा चेहरा पहचान पाना मुश्किल था। कोई मुझे देखता
तो अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था कि कभी मैं वही व्यक्ति था, जो
परमेश्वर के वचन में समय बिताया करता था, जिसकी ज़ुबान पर
प्रार्थनाएँ होती थीं |
अब मेरी हालत ऐसी हो
गई थी कि लोग मुझे देखकर घृणा से मुँह मोड़ लेते थे। मेरे शरीर पर मैले-कुचैले, फटे
हुए कपड़े लटके रहते, मेरी आँखों के नीचे काले गहरे धब्बे थे,
और मेरा चेहरा ऐसा लगता था जैसे किसी ने वर्षों से उस पर मुस्कान की
कोई रेखा नहीं देखी हो।
शैतान ने मुझे अपने
पाप के सागर में इतनी गहराई में डुबो दिया था कि अब वहाँ से बाहर निकलने की कोई
राह, कोई
रोशनी भी नज़र नहीं आ रही थी। मैं पूरी तरह डूब चुका था, इतनी
गहराई में जहाँ सिर्फ अंधकार था—जहाँ न कोई आशा थी, न कोई
राहत, न कोई सहारा | मेरी आशाएँ न जाने
इस विशाल ब्रह्मांड के किस कोने में विलुप्त हो गई थीं। मेरी
आशा का द्वीप न जाने किस गहरे, भूले-बिसरे संदूक में जाकर बंद
हो चुका था, ऐसा संदूक जिसका ताला जंग खा चुका था और जिसकी
चाबी अब कहीं गुम हो गई थी।
एक पागल—भयानक सा रूप
धारण किए, मैं अब अपने ही शहर की गलियों में भटकने लगा। वो शहर,
जो कभी मेरा अपना था, जहाँ हर गली-मोहल्ले में
मैं पहचाना जाता था, अब मेरे लिए अजनबी बन चुका था। मैं अब
किसी के लिए कोई नहीं था—न कोई दोस्त, न कोई अपना। कभी-कभी
यह सोचकर मेरी आँखों से आँसू बह निकलते कि शायद अब हर रिश्ता मुझे भूल चुका होगा।
जिन अपनों की हँसी कभी मेरे कानों में रस घोलती थी, वही अब
मुझे पहचानने से इंकार कर देते होंगे।
मैं खुद को पूरी
दुनिया में अकेला महसूस करने लगा था—एक ऐसा अकेलापन, जो आत्मा को अंदर तक
चीर देता है, जो दिल में एक ऐसी खाई बना देता है, जहाँ बस सन्नाटा गूँजता है। मेरे पास कोई नाम नहीं था, कोई पहचान नहीं थी। मैं था भी या नहीं, शायद इससे भी
अब किसी को फर्क नहीं पड़ता था। बस खामोश सा साया, बेमंज़िल
भटकता, हर रास्ते से ठुकराया, बेखबर सा
चलता। कभी था जिस शहर का अपना एक नाम, आज वही गलियां
पूछें—"कौन है ये अंजान?" आँखों में दरिया,
पर होंठ रहे चुप, दिल में सुलगती आग, पर दुनिया से रूठ। कभी जो रौशनी था, वो जलता सजता
ताज था, मैं बस खामोश सा साया, बेमंज़िल
भटकता जो आज था।
रात के अंधेरे में जब
ठंडी हवा मेरे जर्जर शरीर को छूकर गुजरती, तो लगता जैसे यह दुनिया भी मुझे
ठुकरा रही हो। मैं फुटपाथों पर पड़ा रहता, गली के किसी कोने
में सिकुड़कर रात काटता, और हर सुबह एक नए तिरस्कार के साथ
जागता। हर रात बस न जाने कैसी आवाज़े गूंजती थी मेरे कानो में, मुझे नही पता की वो
आवाजें क्या है, न समझता था उसे, सच में एक पागल सा हो चूका
था मैं |
ऐसे ही वर्ष गुजरते
चले जा रहे थे, और मेरी हालत दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही थी। ऐसा
लगता था मानो मेरी ज़िंदगी की डोर किसी उलझे हुए जाल में फँस चुकी थी, और जितना मैं उससे निकलने की कोशिश करता, उतना ही वह
जाल और कसता चला जाता। मेरा हर प्रयास व्यर्थ हो जाता, हर
चाहत धुंधली पड़ जाती।
रात के सन्नाटे में, जब
पूरी दुनिया चैन की नींद में होती, मैं किसी कोने में बैठकर
अपनी हालत पर आँसू बहाया करता। मैं सोचता, क्या सच में अब
कोई राह नहीं बची? क्या मैं हमेशा के लिए इसी अंधकार में खो
जाऊँगा? मेरी आँखों से बहते आँसू मेरे गालों पर सूख जाते,
लेकिन दिल का दर्द और गहरा हो जाता।
हाँ, इन्हीं
तन्हाइयों में मुझे वो वचन याद आता, वो गीत जो मेरे
माता-पिता मुझे सुनाकर सुलाया करते थे। लेकिन जैसे ही मैं उसे गाने की कोशिश करता,
मेरे होंठ काँपने लगते, मेरी ज़ुबान लड़खड़ाने
लगती। वो दुष्टात्माएँ, जिन्होंने मुझे अपनी बेड़ियों में जकड़
लिया था, कभी भी मुझे वह गीत गाने नहीं देतीं। बस कुछ इस तरह
की जिंदगी में जी रहा था |
बस ऐसी ही एक रात, जब
मेरी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी, जब मेरा रूप किसी
हैवानियत के साए में ढल चुका था, मैं एक सुनसान, अँधेरे रास्ते से गुजर रहा था। हवा में अजीब सी नमी थी, सन्नाटे की चादर हर ओर फैली थी, और मैं... मैं बस
यूँ ही भटक रहा था, बिना किसी मंज़िल, बिना
किसी राह के। इसी भटकते सफर में, न जाने क्यों, मेरी नज़र दूर कहीं एक घर पर पड़ी। घने अंधकार और वीरान रात के बीच वह
अकेला घर था जिसमें रोशनी जल रही थी।
न चाहते हुए भी...
मेरे कदम उस घर की ओर मुड़ चुके थे। मेरा मन तो ठिठक रहा था, पर
मेरा शरीर जैसे किसी अनजानी ताकत के वश में था। मैं धीरे-धीरे, घबराते हुए उस घर की ओर बढ़ने लगा। और तभी... अचानक, एक अनदेखी शक्ति ने मुझे पीछे की ओर खींचना शुरू कर दिया। यह वही शक्ति थी
जिसने सालों से मुझ पर राज्य कर रखा था, जिसने मुझे जकड़कर
रखा था, जिसने मुझे अंधकार में कैद किया था। वह मुझे उस घर
से दूर करना चाहती थी, मानो वहाँ कोई ऐसी चीज़ थी जो मुझे
मुक्त कर सकती थी। पर जैसे ही वह सामर्थ मुझे पीछे खींचने लगी, एक और, नई सामर्थ मेरे भीतर काम करने लगी। यह दूसरी
शक्ति मुझे घर की ओर खींच रही थी, जैसे कोई अदृश्य हाथ मेरा
हाथ पकड़कर मुझे उस रोशनी के पास ले जा रहा हो। अब यह महज़ एक सफर नहीं था—यह दो
शक्तियों का युद्ध था! मैं लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ता रहा। जितनी ज़ोर से
अंधकार की शक्ति मुझे पीछे धकेलती, उतनी ही प्रबलता से यह नई
शक्ति मुझे घर की ओर खींचती। मेरा शरीर काँप रहा था, मेरा मन
अशांत था, लेकिन मेरे भीतर कोई था जो मुझे आगे बढ़ने को कह रहा
था | मैं महसूस कर
सकता था कि मेरे अंदर दो दुनियाएँ टकरा रही थीं—एक जो मुझे नष्ट करना चाहती थी और
दूसरी जो मुझे बचाने को तैयार थी। यह युद्ध सिर्फ मेरे शरीर का नहीं था, यह मेरी आत्मा के लिए था। मैंने महसूस किया, यह दूसरी शक्ति कहीं अधिक सामर्थी
थी। वह अंधकार की ताकत से कहीं अधिक प्रबल थी। और इस खींचतान के बीच, मैं डगमगाते हुए, उस घर के दरवाज़े तक पहुँच ही
गया...
जब मैंने उस घर के
भीतर झाँका, तो देखा—वहाँ एक छोटा-सा परिवार था। माता-पिता अपने छोटे
बच्चे को सुलाने की कोशिश कर रहे थे। माँ उसके सिर पर धीरे-धीरे हाथ फेर रही थी,
पिता हल्की आवाज़ में कोई मधुर गीत गा रहे थे। वह गीत... ओह! वह
गीत! वह वही गीत था जो मेरी माँ बरसों पहले गाया करती थी जब मैं भी उनकी गोद में
सोता था। अचानक, मेरा अतीत फिर सक्रिय हो गया। मेरे भीतर कोई
चलचित्र चलने लगा। मैं फिर से उस बीते हुए समय में पहुँच गया—जहाँ मेरी माँ मुझे
प्रभु के वचन सिखाया करती थी, मेरे पिता प्रेम से मेरा माथा
चूमते थे, और मैं निश्छल भाव से उनके साये में सो जाता था। वो
जगह, वो गीत... उफ्फ! कितना कुछ बदल गया था! लेकिन आज,
इतने वर्षों बाद, वही गीत, उसी कोमल स्वर में मेरे दिल में गूँजने लगा। अब वही अदृश्य सामर्थ जो मुझे
उस घर की ओर खींच रही थी, उसने एक और प्रयास किया। उसने उस
गीत को मेरे दिल से निकालकर मेरी जुबान तक लाने की कोशिश की। पर जैसे ही यह हुआ,
वह दूसरी शक्ति, जिसने मुझे वर्षों तक जकड़
रखा था, भड़क उठी। वह बुरी आत्मा, जो
मुझे बाँधे हुए थी, उसने अपनी पूरी ताकत से मुझे दबाने की
कोशिश की। यह दो शक्तियों के बीच का सबसे भयानक संघर्ष था। एक ओर से मुझे मुक्त
करने की सामर्थ थी, दूसरी ओर से मुझे खत्म करने की ताकत।
और तभी, मेरे
अंदर की सारी यादें जीवंत हो उठीं। उन वचनों का सागर, जो मैं
कब का भूल चुका था, अचानक से मेरी आँखों के सामने खुल गया।
मुझे प्रभु के वे शब्द याद आने लगे जो मेरी माँ मुझे सिखाया करती थी। अब वह बुरी
आत्मा भयभीत हो उठी थी। उसने मुझे दबाने, कुचलने और नष्ट
करने की आखिरी कोशिश की। वह मुझ पर टूट पड़ी। जैसे ही यह वचन मेरे मुँह से निकले,
एक ज़ोरदार झटका हुआ। वह शक्ति, जो मुझे पीछे
खींच रही थी, जिसने मुझे बरसों तक कैद में रखा था, वह बड़े चीख़ के साथ मेरे भीतर से निकल गई।
एक पल के लिए, जैसे
पूरे वातावरण में कुछ बदल गया हो। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, मेरा शरीर काँप रहा था, लेकिन मेरे भीतर एक अजीब-सा
हल्कापन था। मैं मुक्त हो चुका था! मैं डर से काँप उठा। जो अभी-अभी हुआ था,
वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। मैं तुरंत वहाँ से भागा, भागा… और सीधा अपने घर पहुँचा।
दरवाज़ा खटखटाते ही
मेरी माँ ने दरवाज़ा खोला। मुझे देख उनकी आँखें नम हो गईं। मैं रोते हुए उनके गले
लग गया और अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा।
"पिता!
माँ! मैं लौट आया हूँ! प्रभु ने मुझे बचा लिया... मैं अब पूरी तरह से आज़ाद
हूँ!"
उस दिन मेरी ज़िंदगी
पूरी तरह से बदल गई। शैतान की जंजीरें टूट चुकी थीं, मेरे जीवन का नया अध्याय लिख दिया
गया था। मैं प्रभु के चरणों में लौट आया था।
मैंने संकल्प लिया कि
अब न तो मैं दुनिया की चमक-धमक के पीछे भागूँगा, न ही उन गलियों की ओर लौटूँगा जहाँ
मेरा अतीत मुझे बुलाता है। अब न कोई मोह रहेगा, न कोई भ्रम।
बस एक ही लक्ष्य होगा—प्रभु की सेवा, उसके वचन में जीवन
बिताना, और उसकी ज्योति में चलते रहना। वो दिन था... और आज
तक, मैं सिर्फ अपने प्रभु के लिए जी रहा हूँ। उसने मुझे
उठाया, मुझे नया जीवन दिया, और आज मैं
संसार को यही सिखाने के लिए खड़ा हूँ कि कोई भी कितना ही गिर जाए, कितना ही अंधकार में चला जाए, प्रभु की करुणा उसे
फिर से उठा सकती है।
मेरे दोस्तों, मेरी गवाही यहीं समाप्त नहीं होती। यह सिर्फ एक नई शुरुआत थी। सुनिए आगे |
आपको एक दिलचस्प बात बताता हूँ | जिस दिन मैं आजाद हुआ था,
उसके अगले ही दिन मैं उस घर की तलाश में फिर उसी जगह पहुंचा, जहाँ यह सब कुछ हुआ
था मेरे साथ पिछली रात | आप मानेगे नही, वहां कोई घर था ही
नही, पूरा रस्ता सुनसान था, मैंने ढूँढा दूर दूर तक, लेकिन न कोई परिवार मिला
मुझे, न कोई घर | मुझे नही पता कहाँ था, मुझे नही पता वो
परिवार कौन था, मैं नही जनता कुछ, मुझे सिर्फ इतना पता है, की वो था |
उस पल मैंने
महसूस किया कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी। यह मेरे परमेश्वर की महिमा थी! उसने
मुझे बचाने के लिए, मुझे याद दिलाने के लिए कि मैं किसका हूँ, स्वयं मुझे दर्शन दिए थे। यह वही प्रभु था जिसने मुझे मेरी आत्मा के गहरे
अंधकार से निकाला था।
मुझे एहसास
हुआ—मैं अकेला नहीं था, कभी था ही नहीं मैं अकेला। जब मैं अंधेरे में भटक रहा
था, जब पाप के बंधनों ने मुझे जकड़ लिया था, जब मैं अपनी ही पहचान खो चुका था—तब भी वो परमेश्वर मेरे साथ था, वो देख रहा था, मुझे याद आया की वो आवाजें जो सुने
देती थी रातों में, अब मैं समझ सकता हूँ की वो आवाजें किसकी
थी |
हाँ, वो चाहता तो
मुझे शैतान के मुँह में छोड़ सकता था, लेकिन नहीं... जगत
की उत्पत्ति से पहले ही उसने मुझे चुन लिया था। उसने मेरे नाम को अपने हाथों की
लकीरों में लिख दिया था। उसने मुझे अंधकार में खोने के लिए नहीं, बल्कि अपनी ज्योति में चमकने के लिए रचा था। मैं तो बस मिट्टी का एक पात्र
था—टूटने योग्य, बिखरने योग्य, संसार
के धूल में खो जाने योग्य। लेकिन उसने इस मिट्टी को अपनी महिमा के लिए चुन लिया।
और इस मिट्टी के पात्र को महिमायुक्त बनाने के लिए, उसने
स्वयं अपनी महिमा को त्याग दिया। क्या मुझमें कोई खूबी थी कि वो मुझे बचाए? नहीं... मेरे हाथों में तो बस पाप का बोझ था, मेरे
होठों पर तो सिर्फ गलत अलफ़ाज़ थे, मेरे
हृदय में तो बस संसार की इच्छाएँ थी। लेकिन उसमें खूबी
थी... उसका हृदय दया से भरा था। उसकी आत्मा प्रेम
से ओतप्रोत थी। उसकी आगोश में वो अनंत करुणा थी, जो
खोए हुओं को भी अपना बना ले। और इसी खूबी के
कारण, उसने मेरे लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी, उसने मेरे बदले में अपनी साँसें दे दीं। उसने
मेरे हर पाप को अपने लहू से धो डाला।
पूरी गवाही से
मैं आपको कुछ बातें बताना चाहता हूँ:
१.
हम अगर मसीही परिवार में जन्मे हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम शैतान के प्रलोभनों और हमलों से सुरक्षित हैं।
यह मत सोचिए कि आपको कुछ नहीं हो सकता, कि शैतान आपका कुछ
नहीं बिगाड़ सकता—यह एक खतरनाक गलतफहमी होगी। वास्तव में, शैतान
की नजरें खासतौर पर उन लोगों पर होती हैं जो परमेश्वर के करीब होते हैं, क्योंकि वह उन्हें गिराने और उनके विश्वास को नष्ट करने के लिए अवसर की
तलाश में रहता है। बाइबल कहती है, "शैतान गरजने वाले सिंह के
समान घूमता फिरता है कि किसे फाड़ खाए" (1 पतरस 5:8)। वह आपको छोटी-छोटी बातों में
फँसाने की कोशिश करेगा—जैसे लापरवाह बनाना, प्रार्थना से दूर
करना, सांसारिक इच्छाओं में उलझाना, और
धीरे-धीरे परमेश्वर से दूर कर देना। शुरुआत में यह बदलाव बहुत सूक्ष्म होता है,
लेकिन धीरे-धीरे यह हमारे आत्मिक जीवन को नष्ट कर सकता है। इसलिए,
हमें हमेशा आत्मिक रूप से चौकस रहने की जरूरत है। हमें प्रभु के वचन
में स्थिर रहना चाहिए, प्रार्थना में समय बिताना चाहिए और यह
समझना चाहिए कि विश्वास कोई जन्मजात सुरक्षा नहीं, बल्कि
निरंतर आत्मिक संघर्ष और परमेश्वर के साथ एक जीवित संबंध है। अगर हम कमजोर पड़ते
हैं, तो शैतान हमें अपनी जंजीरों में बाँध लेगा, लेकिन अगर हम प्रभु में दृढ़ रहते हैं, तो उसकी
शक्ति हमें हर प्रकार के बंधनों से मुक्त कर सकती है।
२.
यह सच है कि बपतिस्मा लेना एक
महत्वपूर्ण आत्मिक कदम है, लेकिन यह मत सोचिए कि इससे शैतान आपसे दूर हो जाएगा
और अब वह आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह भी एक गहरी गलतफहमी है! वास्तव में,
जब हम मसीह को स्वीकार करते हैं और बपतिस्मा लेते हैं, तब शैतान और अधिक सक्रिय हो जाता है ताकि वह हमें फिर से अपने जाल में
फँसा सके। बाइबल में भी हम देखते हैं कि बपतिस्मा के बाद यीशु को शैतान ने जंगल
में परीक्षा में डालने की कोशिश की (मत्ती 4:1-11)। इसलिए,
मसीह को स्वीकार करना ही सब कुछ नहीं है, बल्कि
अपने पुराने मनुष्यत्व को पूरी तरह उतार कर एक नए मनुष्यत्व को धारण करना भी
आवश्यक है। इसका अर्थ है कि हमें न केवल बाहरी रूप से मसीही कहलाना है, बल्कि अंदर से भी पूर्ण रूप से बदलना होगा। हमें मसीह के स्वभाव को अपनाना
होगा, उसकी शिक्षाओं के अनुसार चलना होगा, और उसकी तरह जीना होगा। जब हम सच में मसीह को पहन लेते हैं—यानी उसके
विचार, उसके गुण, उसकी आज्ञाकारिता,
उसकी नम्रता और उसका आत्मिक बल अपने जीवन में उतार लेते हैं—तब हम
शैतान को कोई अवसर ही नहीं देंगे कि वह हम पर काम कर सके।
और इसी में एक
और बात.... यदि हमने प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार कर लिया
है और अपने पुराने पापमय वस्त्र को उतार फेंका है, तो यह एक महत्वपूर्ण
शुरुआत है। लेकिन यदि उसके बाद भी हम उसी पुराने पापों की राह पर चल रहे हैं,
तो सावधान हो जाओ, मेरे दोस्तों! यह बहुत ही
गंभीर स्थिति है, क्योंकि इसका अर्थ है कि हम आत्मिक रूप से
नग्न हैं। हमने पुराना वस्त्र तो त्याग दिया, बपतिस्मा भी ले
लिया, लेकिन यदि हमने नया वस्त्र—महिमा का वस्त्र, अर्थात् यीशु के स्वभाव को—नहीं पहना, तो हम एक
अधूरे परिवर्तन में जी रहे हैं। यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि शैतान ऐसे लोगों को और अधिक गिराने की कोशिश करता है। प्रभु चाहता
है कि हम केवल नाम से ही नहीं, बल्कि अपने हृदय, विचारों और कर्मों से भी मसीही बनें। इसलिए, हमें
निरंतर प्रार्थना करनी होगी कि, "हे प्रभु, मैं तेरे स्वभाव को पहनना चाहता हूँ। तू जैसे पवित्र है, वैसे ही मुझे भी पवित्र बना। मेरी आत्मा को शुद्ध कर, ताकि मैं सच में तेरा स्वरूप धारण कर सकूँ और तेरा प्रकाश मेरी जीवन से
झलके।" याद रखो, मसीही
जीवन केवल एक क्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सतत यात्रा
है—जहाँ हमें प्रतिदिन अपने पुराने स्वभाव को त्यागकर मसीह के रूप में ढलते जाना
है। जब तक हम यीशु के स्वभाव को पूर्ण रूप से नहीं अपनाते, तब
तक हम आत्मिक रूप से असुरक्षित हैं। लेकिन जैसे ही हम मसीह को धारण कर लेते हैं,
शैतान का कोई भी वार हमें गिरा नहीं सकता। इसलिए, चौकन्ने
रहो, जागते रहो, और प्रार्थना में लगे
रहो!
३.
बहुत से लोग यह सोचते हैं कि यदि वे
मसीही परिवार में जन्मे हैं, चर्च जाते हैं, बपतिस्मा ले चुके हैं, या प्रभु यीशु को अपने
उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार कर चुके हैं, तो वे पूरी तरह
सुरक्षित हैं। लेकिन यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है! आत्मिक जीवन केवल एक बार का
निर्णय नहीं, बल्कि एक निरंतर संघर्ष और जागरूकता की यात्रा
है। मती 12:43-45 हमें एक गंभीर चेतावनी देता है: "जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य में से निकलती है, तो
वह सूखे स्थानों में विश्राम ढूँढ़ती है, पर उसे कहीं चैन
नहीं मिलता। तब वह कहती है, ‘मैं अपने उसी पुराने घर में लौट
जाऊँगी, जहाँ से निकली थी।’ जब वह लौटती है, तो उसे वह घर खाली, झाड़ा-बुहारा और सजा-सजाया मिलता
है। तब वह सात और भी अधिक दुष्ट आत्माओं को अपने साथ ले आती है, और वे उसमें बस जाती हैं। तब उस व्यक्ति की स्थिति पहले से भी अधिक खराब
हो जाती है।" इसका अर्थ यह है कि सिर्फ पाप से
छुटकारा पाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें अपने जीवन को
मसीह से भरना भी होगा। यदि हमने अपने पुराने पापों को त्याग दिया, लेकिन मसीह के स्वभाव को नहीं अपनाया, तो हम एक खाली
घर की तरह हैं—जहाँ दुष्ट आत्माएँ आसानी से लौट सकती हैं। तो करे क्या हम? मसीह का स्वभाव धारण करें, प्रभु के वचन में दृढ़ रहें, प्रार्थना में
लगातार लगे रहें, पवित्र आत्मा का निवास अपने अंदर बनाए रखें और सावधान और चौकस
रहें |
जरूरी नहीं कि
हर किसी को दोबारा अवसर मिले, जैसा कि मुझे मिला। बहुत से लोग
ऐसे भी होते हैं, जो एक बार पाप में गिरते हैं और फिर कभी
बाहर नहीं आ पाते। इसलिए जब तक समय है, जागरूक बनो, मसीह में जियो, और पवित्र आत्मा को अपना मार्गदर्शक
बनाओ। जब शैतान लौटेगा और यीशु के स्वभाव को तुममें देखेगा, तो
वह तुम्हारे जीवन में प्रवेश करने की हिम्मत भी नहीं करेगा! इसलिए, अपने आप को खाली मत छोड़ो—मसीह को अपना सब कुछ बना लो!
अपने बारे में कहूँ तो आज में उस खुदा की सेवा करता हूँ क्यूंकि उसने मुझे
ऐसी भयानक अवस्था से बचाया है | आज मुझ बेसहारे को सहारा मिला है, अब मैं अकेला
नही हूँ उसने मुझ से वायदा किया है, की वो मेरे साथ जगत के अंत समय तक है, और वो मुझे वापिस
लेने भी आएगा, फिर हमेशा
मैं उसके साथ रहूँगा|
असम्भव अवस्थाएं सम्भव कैसे होती है मुझे पता है, अन्धकार में ज्योति कैसे
चमकती है मुझे समझ आ गया है |
आज में उस गीत का अर्थ समझ गया हूँ जिसकी धुन ने हमेशा से मुझे अपनी ओर
आकर्षित किया था:
की जब मैंने सोचा की मैं अकेला हूँ, तब प्रभु यीशु ने मुझ से कहा, संसार के अंत
तक साथ रहने वाला मैं तेरे साथ हूँ |
जब मैंने सोचा की मैं निर्बल हूँ, तब प्रभु यीशु ने मुझ से कहा, शक्ति देने वाला, सामर्थ देने
वाला मैं तेरे साथ हूँ |
जब मैं सोचा की सब असंभव है, तब प्रभु यीशु ने मुझ से कहा, असम्भव को सम्भव करने
वाला मैं तेरे साथ हूँ |
आज जो कुछ हूँ उस खुदा की वजह से हूँ, मैं बिलकुल नही शर्माता यह कहने में की वो
मेरा खुदा है, वो मेरी ताकत
बना है, वो मेरा
सहारा बना है, और सहारा बन
कर हमेशा हमेशा के लिए मेरे साथ रहेगा |
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