ओझल
फिर एक सुबह होगी, पर मैं उठूंगा नहीं,
मुझे आवाज़ दी जाएगी, लेकिन मैं जवाब नहीं दूंगा,
मेरा कमरा शांत रहेगा, पिछली रात लिखा पन्ना अधूरा रह जाएगा,
मेरी कलम मेरा इंतज़ार करेगी, इंतज़ार अधूरा रह जाएगा,
किताबें अधूरी रह जाएँगी, उन पर उंगलियाँ फिर कभी नहीं चलेंगी,
मेरे कदम, मेरी आहट, और वो सारी यादें गुम हो जाएंगी।
हवाएँ यूँ ही चलती जाएँगी, पत्तों की सरसराहट गुजरती जाएगी,
समुंदर वैसे ही उफान भरेगा, वक्त भी चलता रहेगा,
बस जो न होगा, वो हैं मेरे लफ़्ज़, मेरी मुस्कान और मेरा अस्तित्व।
सूरज वैसा ही निकलेगा, लेकिन मुझ पर उजाला न होगा,
दरवाजों पर दस्तक होगी, पर भीतर से कोई जवाब न होगा।
राहों में मेरे निशान होंगे, मगर कोई मुझे न पहचान पाएगा,
साये की तरह मैं खो जाऊँगा, और कोई मुझे तलाश न पाएगा।
किन्ही आँखों में मेरी तस्वीर का प्रतिबिंब होगा,
किन्ही लबों पर मेरा नाम की अधूरी पुकार होगी,
कहीं चेहरों पर मातम, तो कहीं मुस्कान होगी,
कोई यादों में मुझे जी रहा होगा, कोई यूँ ही खामोश होग |
मिट्टी से बना था मैं, और मिट्टी में समा जाऊँगा,
रोता हुआ निकला मैं, कहीं रुलाता हुआ निकल जाऊँगा।
कुछ पल बाद मुझे भुला दिया जाएगा,
मेरी हंसी, मेरे लफ्ज़, धुंधला दिया जाएगा।
जो था कभी ख़ास, अब वो सिर्फ यादें बन जाएं,
और उन यादों को भी धीरे-धीरे मिटा दिया जाएगा,
एक छोटा सा सवाल करना, मेरे जाने के बाद उस मिट्टी से,
क्या वो मिट्टी खुश है जिस से मैं बना था?
क्या वो खुश थी जब मैं उसमें समाया था?
एक छोटा सा सवाल करना, मेरे जाने के बाद उस ज़िंदगी से,
क्या वो जिंदगी का कुछ अर्थ निकला, जो मैंने जी थी?
क्या मेरे हर कदम मुझसे खुश थे?
या बस वक्त की धारा सा मैं बहता चला गया,
और यूँ ही अर्थहीन जिंदगी को जीता चला गया।
क्या था ये सब मेरे रब्बा!
कुछ लम्हों के लिए क़ैद हुआ था जिंदगी में, अब आज़ाद हो गया हूँ,
तेरा था इंतजार, अब तु मेरे करीब, मैं तेरे करीब आ गया हूँ।"
ज़िंदगी है साहेब!! गुज़र जाएगी,
मेज़ पर होगी तस्वीर, कुर्सी खाली रह जाएगी!!
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