बचपन
अब इस सफ़र में न जाने क्यों खौफ था,
शायद कुछ पीछे छोड़ आया हूँ
कुछ यादें, कुछ पल, और एक ज़िंदगी,
इस सफर ने अपनी मंज़िल का पता बदल लिया है
हमसे गुजरी हर वो गलियाँ, अब वीरान हो गई हैं
बचपन की मासूमियत, अब जिम्मेदारियों में ढल रही है
बचपन की वो धुनें मानो अब इन हवाओं में खो गई हैं
वो मस्ती भरी रातें, अब यादों के झरोंखो में सिमट गई हैं
मुस्कुराते थे कभी जो लब, अब खामोश हो चले है,
खुले आसमानों मे उड़ने वाले परिंदे, पिनज़रो मे कैद हो चले है
घूरे से उभरे थे जो अक्स, फिर मिट्टी मे कहीं मिल चले है
बचपन के वो सपने, अब धुंधले हो चले है
वो नन्ही-नन्ही बातें, अब ख़ामोशी में बदल गई हैं।
बचपन के वो खेल, बस अब कहानी बन गई हैं।
बचपन की वो चंचलता, अब गंभीरता बन चली है।
बचपन की हर याद, अब दिल की तिजोरी में समा गई है
जो साथ था, वो आज पास नहीं है,
गुज़रे लम्हों की खुशबू का अब एहसास नहीं है।
वक़्त की रेत में लिखी बचपन की जो बातें थी
अब मिट कर बस ख्वाहिश मे बदल गई है
आगे के रास्ते अनजाने से लगते हैं,
बीते दिनों की छाया अब फीकी जान पड़ती है।
दिल की धड़कनों में बस एक ही आवाज़ है,
की काश वो बचपन का सवेरा, फिर लौट कर आ जाये
आज मासूम ख्वाहिशें, अरमान बन गईं, पता ही न चला
वक़्त की धारा में, बचपन की बातें कब खो गईं, पता ही न चला
हर कदम पर मंज़िलों की तलाश में,राहे बदल गई पता ही न चला
ये आज़ाद परिंदे, अपनी उड़ाने भूल गए, पता ही न चला
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