इंसान की विडंबना
इंसान की विडंबना - लगता कुछ और है होता कुछ और है
हर मोड पर है डर ज़िंदगी मे
जिसका असर है ज़िंदगी मे
हर कोई करता हमे हराने की साजिशें
तोड़ने का ज़ज़्बा रखते हम, हर तरह की बंदिशे
क्यों वक़्त को बेकार समझता है इंसान ?
हर खूबी को बस रोका करता है इंसान
क्यों हार के साथ समझौता कर लेता है इंसान ?
खुद को खुद ही से परेशां कर जाता है इंसान
क्यों धर्म के नाम पर इंसानियत के लिए बंध जाता है इंसान?
अपने ही लिए दुश्मनो की गिनती बढ़ा लेता है इंसान
क्यों अन्याय के नशीले रंगो मे रंग जाता है इंसान?
खुद को खुद ही इन दूरियों मे संजोड जाता है इंसान
क्यों धर्म के एहसानो के बोझ तले दब कर रह जाता है इंसान?
इंसानो के बीच दीवार बन बंट जाता है इंसान
क्यों इन दर्द को को मेहसूस नहीं कर पाता है इंसान?
खुद को खुद ही इन विचारधाराओ मे दफन कर जाता है इंसान
क्यों भटकाव के साथ अपने आप को साझा करता है इंसान?
अपने ही उपर अन्याय के बंधन बाँधा करता है इंसान
क्यों बाहर खुश, अंदर मुस्कुराना भूल जाता है इंसान ?
खुद को खुद ही अंधेरी रातों मे पहुंचा जाता है इंसान
साहेब!!
इन भटकते मुसाफिरों को, कोई इनकी मंज़िल का पता दे
जो इनकी सोच के परे हो, वह दास्ताँ कोई इनको बता दे
इन अंधेरी रातों के बाद, कोई इन्हे एक नई रोशनी दिखा दे
इन दुखी इंसानों को, हर हालातो मे कोई मुस्कुराना सिखा दे
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