आज़ाद हिंदुस्तान की पुकार
बंधी अवस्था मे मैंने आज़ादी के सपने देखे थे
जहाँ नफ़रत नहीं दूर कहीं मोहब्बत के अपने देखे थे
आज़ाद परिंदो को अपनी चाल ढाल से उड़ान भरते देखा था
बंधे हिंदुस्तान को उभरता हुआ चमकता एक सितारा देखा था
मेरी मिट्टी मे दफ़न है कई एक लाडले जवान
जो अपनी जान मुझ मे न्यौछावर कर चले है
हाँ!! हर गर्दिशों को पार कर
वो आज़ाद हिंद की खुशबू की बौछार कर चले है
याद करता हूँ वो समा जब दुश्मनो का जहन टूटता था
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई का दिल से दिल जब जुड़ता था
एक होकर चल पड़े थे खूँ पसीना एक कर
टुकड़े टुकड़े जुड़ जुड़ कर ताज़ हिंदुस्तान के नाम पर
दुख होता आज फिर वही उन हालात पर
लुप्त हुई मोहब्बत इंसान लेटा जैसे शमशान पर
अब धर्मो के नाम बंट चुका हिंद कई हिस्सों मे
नफ़रत ही नफ़रत अब हर बात हर किस्सों मे
बंधा हिंद जरूर था लेकिन साथ पर गरूर था
अब देखा हिंद को तो हर इंसान कहीं मगरूर था
टूट चुका था अब मैं देख इस हिंद हो
जहाँ फ़ासला भरपूर था दिल दूर दूर था
जशन होता मोहब्बत के कत्ल पर मेरी घनघोर हालात थी
मेरी ही मिट्टी के लोग अब नफ़रत के पुर ज़ोर आलात थे
अन्याय का नशीला रंग हिंद को रंगा जा रहा है
खुद को खुद ही इन दूरियों मे संजोडे जा रहा है
बंधी अवस्था मे मैंने आज़ादी के यह सपने न देखे थे
जहाँ मोहब्बत नहीं दूर कहीं नफ़रत के अपने देखे थे
आज़ाद परिंदो को अपने गरूर के चलते गिरते देखा था
आज़ाद हिंदुस्तान तो मुरझाया सा एक सितारा दिखा था
वो आज़ाद अक्स मैं अपने लोग, अपनी मिट्टी मे फिर देखता हूँ
फिर मोहब्बत का जशन और एकता का सहारा देखता हूँ
फिर पर्रिंदो की ऊँची उड़ान और हिन्द के सिर ताज देखता हूँ
फिर हिंदुस्तान को उभरता हुआ चमकता सितारा देखता हूँ
मैं आज़ाद हिंदुस्तान आपसे फिर यह विनम्र पुकार करता हूँ!!
आज़ाद हिंदुस्तान की पुकार
Ashish George
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