"वीरों की विरासत"

हिंद की मिट्टी में समा, रक्त उस शरीर का

लिपटा है कफ़न में देखो, हिंद के उस वीर का।

देश की इस शान में सब कुछ न्योछावर था,
देश का जवान वो, हिंद की धरोहर था।

शहीदों की कुर्बानी, था हिस्सा उनके जुनून का,
देशभक्ति की ज्योत में जला, बहा जो उनका ख़ून था।
मिट्टी के हर कण-कण में उनकी अनूठी कहानी है,
आज़ादी के इस सूरज में बसती उनकी अमर निशानी है।

सपनों की उड़ान है, हर दिल में कोई उम्मीद है,
हिंद का जवान तो फिर, वो उसका ही मुरीद है।
हर धर्म की ये वीरता, उनकी ये कहानी है,
हिंदुस्तान की मिट्टी ही अब सबकी निशानी है।

बिखरा नहीं था उस दिन, जब शहीदों का ख़ून बहा था,
आज़ादी की उस जंग में, जब अदम्य साहस जगा था।
आज ख़ौफ़ है उस दर्द का, जो धर्म के नाम सहा था,
समाज में ये दूरियाँ, ये दिल को तन्हा ठहरा था।

टूटा नहीं था मैं, जब मंज़िल सिर्फ़ आज़ादी थी,
संघर्ष के वो पथ पर, हिम्मत और समझदारी थी।
तड़पता हूँ हर वक़्त, अब मंज़िल जो बर्बादी की लगती,
स्वप्न है स्वर्णिम कल का, तब सत्य की आबादी दिखती।

धर्म की दीवार गिरा अब, मोहब्बत के रंग से,
हिंद को सजाना है, नये दौर के तिरंग से।
दिल में अब हिंद हो, धर्म न पहचान हो,
जब लबों में समा जो अब नाम हिंदुस्तान हो।

साहब!!

हम वो हिंदुस्तान के परिंदे हैं,
जो ऊँची उड़ानों का शौक़ रखते हैं।
डर-डर में गिरने का ना जो ख़ौफ़ रखते हैं,
बुलंदियों को छूकर, आज आसमानों में राज़ है।
नाज़ है इस हिंद पर, हम जो वक़्त के सरताज हैं! 

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