kABHI KABHI
ख़ामोश हो कहीं, दुखी हो जब कभी-कभी,
ज़िंदगी के इस सफर में, खोए हो कभी-कभी।
मुस्कुराहट भी है यहाँ, आँसुओं का सिलसिला,
दिल की गहराइयों में, जज़्बात भी टूटे कभी-कभी।
सपनों की परछाइयाँ, राहों में बिछती रहीं,
चले थे जहाँ उम्मीद से, उलझनें वहीं मिलती रहीं।
थोड़ी सी धूप है कहीं, तो कहीं घने साए हैं,
कभी राहतों के पल, तो कभी ग़म के साए हैं।
पर उजालों की लौ से, अंधेरों को मिटा देना,
गर थक जाओ कहीं, तो ज़रा ठहर भी जाना कभी-कभी।
मंज़िलें बुलाएँगी, सफ़र जो चाहे धीमे हो,
सब्र से जो चल पड़े, मंज़र वही नगीने हों।
हवा के संग बहने दो, ख़्वाबों को तुम सजने दो,
मुस्कुराकर अपने दिल को भी धड़कने दो कभी-कभी।
हौसलों की छाँव में, राहें भी मुसाफ़िर की,
जो संग चले हौसला, क़दमों में ही ज़मीन हो।
ख़्वाबों की उड़ान को, परवाज़ जो मिल जाए,
आँधियाँ भी थम जाएँ, गर यक़ीन रहे कभी-कभी।
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