lEKHAK
जो बातें बयाँ न हो सकीं, उनको शब्दों में पिरो दिया है,
दिल के गहरे ज़ख़्मों को स्याही से उकेर दिया है।
जो एक पल था ज़हन में, वो अब काग़ज़ पर उतार चुका हूँ,
मैं लेखक हूँ साहब!! अपनी सोच को अमर कर चुका हूँ।
मेरी कहानियों में दर्द मिला, कहीं कोनों में रोशनी भी,
मेरे अल्फ़ाज़ों में ढूंढो तो ज़रा, मिलेगी एक दुनिया भी।
हर लफ्ज़ मेरी साँसें हैं, हर कहानी मैं जी चुका हूँ,
मैं लेखक हूँ साहब!! अपने एहसास को अमर कर चुका हूँ।
कुछ एहसासों ने लफ़्ज़ों में ढलना न चाहा, उन्हे अशआर बना दिया,
कुछ दर्द दिल में सिमट कर रह जाना चाहा, उन्हें अफसाना बना दिया,
जो आंसू आँखों में ठहर गए थे, उन्हें काग़ज़ पर बहा चुका हूँ,
मैं लेखक हूँ साहब!! अपनी हर चुप्पी को आवाज़ बना चुका हूँ |
कभी अश्कों से लिखा, कभी ख़ुशी से भीगे लफ्ज़ रचे मैने,
कभी खामोशी को आवाज़ दी, कभी एहसास शब्दों में बुने मैने,
जो जज़्बात दिल में कैद थे, मैं उन्हें कविता का रूप दे चुका हूँ,
मैं लेखक हूँ साहब!! अपनी हर धड़कन को स्याही में ढाल चुका हूँ |
मेरी ग़ज़लों में तड़प भी है, कहीं मोहब्बत की नमी भी,
मेरी कहानियों में बिछड़ने का दर्द है, तो मिलने की खुशी भी।
हर सफ़हा मेरे वजूद का हिस्सा है, हर शब्द में मेरी जान बसती है,
मैं लेखक हूँ साहब!! अपनी हर धड़कन को अमर कर चुका हूँ।
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