" Me And My Friend Ezekiel"

An Dramatical Imagination 

 मैं और मेरा दोस्त यहेजकेल, हम दोनों बचपन के मित्र थे | हमेशा से साथ रहे है, साथ पढ़े है, साथ खेले है | हम दोनों के घर पास-पास में थे, इसीलिए अधिकतर वक्त हम साथ में ही गुजारा करते थे | लेकिन हम दोनों के बर्ताव व् आदते बिलकुल एक दूसरे से विपरीत थी, वो था एक शांत सा, भोला इंसान, और मैं था गुस्सैल, शैतानिक दिमागी इंसान |  

हमेशा से ही यहेजकेल मुझ से हर कामो में आगे था, चाहे वो पढाई की कक्षाएं हो, या खेल-कूद ke मैदान हो, हर बातो में वो मुझ से तेज़्ज़ (inteligent) था | इसलिए उस से मैं मन ही मन थोड़ा सा जलता था, क्यूंकि वो हर बार मुझ से आगे निकल जाता था | और उसके intelligent (तेज़्ज़) होने की वजह थी की वो प्रभु को बहुत मानता था, उनसे प्रार्थना करता था, उन पर उसे बहुत ज्यादा विश्वास था,  और रही बात मेरी, तो मैं तो बस रविवार को सिर्फ 2 घंटे के लिए प्रभु को अपना चेहरा दिखाता था, सरल भाषा में कहूं तो मैं रविवार को २ घंटे की मुँह-दिखाई की रस्म निभा कर आता था मज़बूरी में बगैर मन से  | और इन २ घंटे में भी, ना जाने मन की खयालो की गाडी में कहाँ- कहाँ पिकनिक (घूम) कर आ जाता था | बाकि ६ दिन तो ना जाने कोनसा हैवान मुझ में बैठा रहता था, जिस से सब परेशान रहते थे |  बस यूँही मेरी जिंदगी गुजरती थी ||  


बस यूँही दिन गुजरते गए, हमने अपनी विद्यालय की पढाई पूरी की , और मैंने  एक विज्ञान का विद्यार्थी के रूप में, और उसने एक वाणिज्य के विद्यार्थी के रूप में पढाई के दूसरे अध्याय अर्थार्त  महाविद्यालय में प्रवेश किया | हमारी कुछ आदतों- बर्तावों  में बदलाव साफ़- साफ़ नजर आने लगे थे अर्थार्त हल्की सी परिपक्वता झलक ने लग गई थी | लेकिन मेरे दोस्त में एक नई आदत उभर आई थी, अब जब भी वो मुझ से मिलता तो अपने प्रभु के बारे में बताने लगता था, मेरी उसे रोकने की लाख कोशिशों के बावजूद वो  मुझ से प्रभु के बारे में बात किया करता था | लेकिन अब तो मैं भी कम थोड़ी हूँ, विज्ञान का छात्र हूँ , इसीलिए अब जब भी वो मुझे प्रभु के बारे में बताता, तो में उसे अपनी विज्ञान के अनेक सिद्धांतो की परिक्रमाओ में फंसाने की कोशिश करता था, और उसकी हर बातो को इन सिद्धांतो के जरिये खंडन करने कोशिश करता था | 


ना जाने उसे प्रभु में क्या दिखता था....बस हर वक्त ही प्रभु...प्रभु  ...... का मंत्र जपता रहता था | 

और फिर में ठहरा विज्ञान का छात्र, अर्थार्त ज्ञानी इंसान, यानी हमारे अनुसार तो प्रभु नाम का शक्श तो दूर की बात ऐसी कोई चीज़ भी नहीं है.... तो मैं प्रभु पर ऐसे कैसे विश्वास कर लूं | 

मेरे लिए तो अब मेरा एक ही प्रभु था, और वो है " विज्ञान" ...इसीलिए मुझे लगता था की  यहेजकेल की दिमागी हालत ठीक नहीं है, वो बस मनगढ़त कहानी बनाकर , सबके सामने बोलता रहता है |  


ऐसे दिन वर्षो में बदलते चले गए..... 

अब में बड़े शहर के एक नामी हस्पताल का एक नामी ( celebrity type) डॉक्टर बन गया था, और वो यहेजकेल उसी अपने गाँव में नौकरी कर रहा था... .......

मैं कभी- कभी यह सोच कर हँसता था ..... की मैं बगैर किसी प्रभु के इतना बड़ा इंसान अर्थार्त डॉक्टर बन गया ....और वो यहेजकेल उसी गाँव में नौकरी कर रहा है..... सत्य कहूं तो मुझे प्रभु शब्द बिलकुल भी पसंद नहीं था..... लेकिन पता नहीं वो यहेजकेल का विश्वास अपने प्रभु पर अभी भी कायम था ..ऐसे ही वो परमेश्वर के जितना नजदीक बढ़ता गया...  मैं उतनी ही दूर होता गया......|||


इसी तरह वक्त के साथ मैं अपनी जिंदगी में आगे दौड़ता गया.... और वक्त के साथ ही हर रिश्ते-नाते कमजोर करता गया ||..कहाँ एक समय पूरा वक्त हम  साथ रहते थे... अब ना जाने वो वक्त कहाँ गुम हो गया था की ab to बात करने का भी वक्त नहीं मिलता था....ख़ास कर मुझे..... .....


बहुत सालो बाद मेरा फिर यहेजकेल से मिलना हुआ .... वो कहीं जा रहा था..... मेने उस से पूछा..." की कहाँ जा रहे हो"...??    तो उसने मुझे बताया की "प्रभु ने उसे एक जगह जाने को बोला है, वो वहीं जा रहा है......" 

हद है यार....मुझे गुस्सा आया .....की फिर प्रभु....मुझे ताजुब हुआ की इसमें से अभी तक इस प्रभु का भूत निकला ही नहीं .... जब भी यह मुँह खोलता है...वही प्रभु ......मन्त्र चालू कर देता है.....

इस बार मैने मन बना लिया की विज्ञान की मदद से इसमें प्रभु क्या....प्रभु का नाम तक रहने नहीं दूंगा.... नहीं !! इसमें से प्रभु निकला पड़ेगा.....|| इसीलिए मैंने उस से कहाँ की मैं भी तेरे साथ चलता हूँ.......

यहेजकेल एक ऐसी तराई में आया,जहाँ चारो तरफ सिर्फ हड़िया ही हड़िया है.....|| मैं विचार करने लगा ...की...यह कैसा इंसान है......एक मनगढ़त प्रभु ने बोलै इसे ...और यह उठकर आ भी गया ...ऐसी जगह में......mind crack है...सही में पागल है...यह यहेजकेल.....!!!

यहेजकेल उन हड़ियो के चारो तरफ घूमता है .... और वो देखता है...और देखने पर उसे मालूम होता है यह जो हड़िया है, वो पूरी तरह से सुखी हुई है.... और बहुत पुरानी है.... वैसे मैं एक डॉक्टर हूँ.... और इस बात से मैं यहेजकेल से बिलकुल सहमत था....और फिर मैं जीवविज्ञान (बायोलॉजी) का छात्र रहा हूँ... तो जीवविज्ञान के छात्र को तो अपने आप ऐसी जगहों पर रूचि आ जाएगी.... इसीलिए मैं वहां इंतज़ार करने लगा की देखे आगे क्या - क्या होता है....||| 


उसी वक्त परमेश्वर का आदेश उसके पास आता है....एक सवाल के रूप में.... यहेजकेल " क्या इन हड़ियो में प्राण आ सकते है क्या...., क्या ये वापिस जी सकते है ...????

अब मेरी हो गया हंसी चालु ----मैंने यहेजकेल से पूछा..... यार, यहेजकेल !!!...यह कैसा फालतू का सवाल है...इतना तो तुम्हे...तुम्हे क्या...तुम्हारे प्रभु को भी मालूम होना चाहिए की एक इंसान अगर मर जाता है तो वापिस नहीं जी सकता है....अनपढ़ बेवकूफ.....


यहेजकेल ने यहोवा को जवाब दिया" की है प्रभु !! यह तो आप ही जानते है.....|| 

मैं थोड़ा हैरान हो गया की उसने साफ़-साफ़ ' ना' क्यों नहीं कहाँ ...मैंने यहेजकेल  से कहाँ...भाई यार....यह कैसा जवाब दिया है तूने ...विज्ञान यह साफ़-साफ़ सिद्ध करता है की अगर कोई इंसान मर जाए तो वो किसी भी हालत में वापिस नहीं जी सकता है.... और फिर.... यह सब कोई सोते हुए लोग थोड़ी है...जिसे आप जब चाहे जगा देंगे..... यह सुखी कंकाले है , वो भी बहुत पुरानी.... !!!!! 


लेकिन यहेजकेल ने मुझे जवाब कुछ यूं दिया... " आशीष !! तुझे यह सुखी कंकाले, हाड़ियाँ  दिखाई दे रही है, लेकिन मुझे.... मुझे , मुझ से ऐसा सवाल करने वाला सर्वशक्तिमान यहोवा दिख रहा है.....

- यह वो यहोवा है जिसने " कुछ नहीं "  से " सब कुछ " बना डाला ...यहाँ कम से कम यह हाड़ियाँ तो है 
  ना.... लेकिन वहां कुछ नहीं था.... और उस " कुछ नहीं "  से उसने " बहुत कुछ बना दिया " ... 
- यह वो यहोवा है जो असंभव अवस्था को संभव अवस्था में तब्दील करने की काबिलियत अपने आप में 
  रखता है |
- यह वो यहोवा है, जो हमारी हार में, हमारी जीत बन हमसे एक विजयी शुरुवात करवाता है...| 
- यह वो यहोवा है जब पूरी दुनिया हमारे खिलाफ खड़ी होती है, तब हमारा हाथ पकड़ के हमारे साथ खड़ा 

  हो जाता है......|| 


फिर परमेश्वर ने यहेजकेल से कहा " की तू  इन हडियों से भविष्यद्वाणी करदे....की यह ज़िंदा हो जाए .....!!!

मुझे लगा की यहेजकेल भविष्यद्वाणी नहीं करेगा... क्यूंकि एक पल तो उसके मन में शंका आ ही जाएगी की अगर कुछ नहीं हुआ तो ..... तब तो आशीष क्या...पूरी दुनिया मुझ पर हँसेगी.....लेकिन पता नहीं उसे कैसा भरोसा था अपने प्रभु पर ....और उसने भविष्यद्वाणी कर दी .........

कुछ देर सनाटा..... छा... गया.... कुछ नहीं हो रहा.... वक्त गुजर रहा था..... और वक्त की गुजरती तेज़्ज़ी से ही मेरे चेहरे पर मुस्कान बढ़ रही थी ..... हद है.....यार ऐसे कैसे कोई इतने बड़े विज्ञान के सिद्धांतो को असत्य साबित कर दे......अनपढ़ गवाँर की बस की बात तो बिलकुल नहीं.........इंतज़ार जारी....


लेकिन यह क्या...?? एक आहट होती है.... और धीरे-धीरे वो हाड़ियाँ अपनी-अपनी हडियों से जाकर जुड़ने लगती है..... और उन पर मांस चढ़ जाता है...... .   

 मेरा मुँह खुला का खुला रह गया ....अविश्वसनीय ...मेरी नजरो के सामने ऐसे कैसे हो सकता है..... मुझे विश्वास नहीं हो रहा था,,,की विज्ञान का एक सिद्धांत असत्य साबित हो गया था.....


लेकिन मैं भी ऐसा - वैसा इंसान नहीं हूँ.... विज्ञान का पुत्र हूँ..... विज्ञान के लिए लडूंगा..... 

मैंने अपने आप में समझ लिआ...की यह यहेजकेल हाथो की कलाकारी से मुझे बेवकूफ बना रहा है.... इसीलिए मैने उसे फंसा ने उपाय सोचा....मैंने उस से कहा.... " चलो यहेजकेल...मान लिया हाड़ियाँ जुड़ गई... मांस भी चढ़ गए... लेकिन.... है तो अभी भी यह मरे हुए...लाश .... सांस कहा है.....?? सांस तो लाओ ...?? मैने सोचा था की सवाल में तो यहेजकेल ढेर हो जाएगा.., अपनी हार मान ही लेगा..........

लेकिन.... पता नहीं... यहेजकेल को उसके परमेश्वर पर कैसा विश्वास था...... बंदे ने अपने स्वभाव की तरह बड़े (कूल) शांत अंदाज़ में मुझे जवाब दिया....की.....

" आशीष, जब परमेश्वर ने यह दुनिया बनाई थी... तब उसने हम इंसानो को सिर्फ मिटटी से बनाया और अपने नथनों से उनमे सांस फूंका... और वो ही सांस आज तुझ में और मुझ में चल रही है....

और फिर तू ही सोच अब....... यहाँ कम से कम इंसान का शरीर तो है ना,,, वहां सिर्फ मिटटी ही थी... 

उस मिटटी से अगर खुदा इंसान बना सकता है तो यहाँ सांस क्यों नहीं दे सकता...??? 

और सुन आज तेरे सामने यह जो काम हो रहे है ना.... इसे जिसने शुरू किया है ना, वो इसे खत्म करने में भी सामर्थी है.... उसने अगर बुलाहट दी है ना...तो वो मंज़िल तक जरूर पहुंचाएगा.....|||


बंदे की बात में दम था.... उसके विश्वास की दाद देनी पड़ेगी.....

परमेश्वर का आदेश यहेजकेल के पास फिर पहुंचता है.... " की सांस से भविष्यद्वाणी कर दे....की इनमे आ बसे......""  !!!!   उसने भविष्यद्वाणी कर दी....  और....और... मेरी आँखों के सामने वो लोग अपने-अपने पैरो पर खड़े हो गए...... 

मैं डर गया....... यह क्या हो रहा है..... मैं एक नामी डॉक्टर हज़ारो जोखिम भरे ऑपरेशन किये.... इंसान को लगभग मौत के मुँह निकाल कर  लेकर आया हुआ एक डॉक्टर.... फिर भी हाथ आज तक नहीं काम्पे, लेकिन आज मैं डॉक्टर....ऊपर से निचे तक पूरा कांप गया ...... 

ऐसे कैसे हो सकता है.... आज मेरी आँखों के सामने मेरा खुदा विज्ञान आज मामूली सा एक विषय ही रह गया. मैने इसे खुदा माना था,... लेकिन यह तो एक हवा का झोंका निकला..... मैं अपनी आँखों से विश्वास नहीं कर पा रहा था..... 

लेकिन उस दिन मैं समझा गया. 
- यहेजकेल को अपने परमेश्वर जो घमंड था ...वो आखिर क्यों था. ?.....
- उसे जो अपने परमेश्वर पर विश्वास था...वो क्यों था.....

यहेजकेल को परमेश्वर ने कहा भविष्यद्वाणी कर ....और उसने कर दी..... उसने एक पल भी नहीं सोचा की अगर आज इत्तेफाक से कुछ नहीं हुआ.... तो वो पीछे खड़ा उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी आशीष , उस पर हसेंगे ....पूरी दुनिया उस पर हँसेगी.... उसने यह बात सोची ही नहीं .... उसने सिर्फ अपने परमेश्वर यहोवा की ही और नजर रखी .....

अब सोचने की बारी हमारी है.....- 
एक इंसान के कहने से इतना कुछ हो सकता है , तो यीशु जो खुद परमेश्वर है, उसके नाम से हीक्या कुछ ना हो जाए......परमेश्वर ने यहेजकेल के जरिये विश्वास का इतना अच्छा उदाहरण दिया है.... 

इस imagination के जरिये मैं हर पाठको से एक सवाल करना चाहूंगा.... 
हमारी जिंदगी में भी ऐसी अनेक परेशानियां आती है, अनेक संकट आते है.... निराशाएं आती है... असफलता आती... अकेलापन आता है.... ......इन वक्तो में, इन समय में हम क्यों नहीं उस परमेश्वर पर भरोसा कर पाते है, क्यों हम उस खुदा को भूल जाते है .......

अगर हम ऐसे वक्तो में उस खुदा पर भरोसा रखे , तो थोड़ा कुछ नहीं, बहुत कुछ असंभव संभव में बदल सकता है..... , निराशाओ में आशाओं की किरण दिख सकती है...., निर्बलताओं में हमे शक्ति मिल सकती है ... हर प्रकार के सवालों का बखूबी जवाब मिल सकता है.... 
सिर्फ और सिर्फ यीशु पर विश्वास करने से.... !!!!!  

आखिर में कुछ बाते बोल मैं इस imagination को विराम देना चाहूँगा.....
 एक गीत की पंक्ति कुछ यूँ कहती है - 

" यह मत कहो खुदा से, मेरी मुश्किलें बड़ी है ,
  लेकिन हर मुश्किलों से कह दो , मेरा खुदा बड़ा." 

  आती हैं आंधियां तो कर उनका खैर मकदम
  तूफां से ही तो लड़ने खुदा ने तुझे गढ़ा है

  अग्नि में तप के सोना है और भी निखरता
  दुर्गम को पार कर के हिमालय कोई चढ़ाए
  लाएगी रंग मेहनत आखिर तुम्हारी इकदिन
  होगा विशाल तरुवर,वो बीज जो पड़ा है

  वो सर्व शक्तियों से जब साथ है हमारे
  हर काम उसके रहते हरदम हुआ पड़ा है   
  कभी हारना ना,हिम्मत के कदम बढ़ाओ  
  हज़ारों कदम बढ़ाने    वो सामने खड़ा है


- Ezekiel - 37 :1-10 

- Ashish George  

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