Mohabbat - A True Story
मोहब्बत-ए-मसीहा
मोहब्बत, एक लफ्ज़ जिसे इस दुनिया ने कभी पुरा
होते नहीं देखा था, कुछ अधुरा सा, कुछ
अनोखा सा एक ऐसा अनुभव, जिसकी शुरवात क्या अंत क्या, जिसकी
सीमा क्या, वक़्त क्या, जो हमेशा सवालो से घिरा, जिसे समझ पाना मुश्किल जान पड़ता है
| मोहब्बत, जहाँ बलिदान है, मोहब्बत
जहाँ आज़ादी है, मोहब्बत जहाँ जीवन है | मोहब्बत तरह तरह की होती है, जैसे माँ को अपने बच्चे
से, जो हर साँसों में मम्तत्व का आभास देती है, मोहब्बत, जैसे नदी को अपने किनारों से है, जो उसे सहेजते हैं और उसकी राह बनाते हैं। मोहब्बत, जैसे
पहाड़ों को घने बादलों से है, जो उसकी ऊँचाई को शीतलता का
एहसास देते हैं। मोहब्बत, जैसे सूरज को अपने प्रकाश से है,
जो हर दिशा में रोशनी का प्रसार करता है। मोहब्बत, जैसे समंदर को अपनी लहरों से है, जो उसकी विशालता
में चंचलता भर देती है। मोहब्बत, जैसे शब्दों को अपने अर्थ
से है, जो मौन को गहराई का रूप देता है। मोहब्बत जैसे आसमान
को अपने सितारों से, मोहब्बत, हर कण में व्याप्त है, हर भावना में समाहित है, और यही इस जीवन का सार है। एक ऐसी ही मोहब्बत,
सृष्टिकर्ता को उसकी सृष्टि से भी है, जो
इंसानो को उसके खुदा से जोड़ती है, जो इंसानो को पाप से
आज़ाद करती है, जो इंसानो को जीवन देती है | मोहब्बत की शुरवात खुद पर्मेश्वर् से हुई, क्यों की
पर्मेश्वर् मोहब्बत है | उसी मोहब्बत के चलते पर्मेश्वर् ने
इस ब्रम्हांड को सृजा, उसमे मोहब्बत के बीज बोये, मोहब्बत यूँ ही बढ़ती गई, फलती गई और हर जगह समा गई |
और उस मोहब्बत को इंसान नही चख पाया तो उसने ज़िंदगी जीने का असल
मकसद ही प्राप्त नहीं किया, क्योंकि ज़िंदगी की शुरवात,
ज़िंदगी का सफ़र, और ज़िंदगी का अंत सब
मोहब्बत है, और अगर हम उस मोहब्बत मे नही बने, तो उस खुदा मे हम नहीं बने, क्योंकि मोहब्बत
सर्वोच्च है |
आदि
में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। अपने शब्दों की अद्भुत सामर्थ्य से
उसने पूरी कायनात को रचा, और देखा कि सब कुछ बहुत अच्छा था।
परमेश्वर मोहब्बत से परिपूर्ण है और वह हमेशा से यह चाहता था कि उसकी यह मोहब्बत
किसी पर प्रकट हो, जिससे वह संवाद कर सकें, जो उसके साथ रहे। लेकिन परमेश्वर ने देखा की उसके वचनों की सामर्थ से बनी
सृष्टि के प्रति वो मोहब्बत व्यक्त नही कर सकता, इसलिए उसने अपनी सबसे श्रेष्ठ
रचना को आखिर में बनाया, अर्थात् इंसान। मिट्टी में अपनी
कलाकारी का प्रदर्शन करते हुए, उसने इंसानों को अपने स्वरूप
में गढ़ा और अपनी सांस देकर उन्हें जीवित प्राणी बनाया। इंसान
परमेश्वर की सबसे अनमोल सृष्टि कहलाता है, क्योंकि उसे वचन की
शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और अद्भुत कलाकारी से गढ़ा
गया। परमेश्वर ने इंसान को अपना स्वरूप दिया और अपनी सांस फूंककर उसमें जीवन का
संचार किया।
परमेश्वर
ने एक आदर्श दुनिया बनाई और पहले मनुष्यों, आदम और
हव्वा, को अदन की वाटिका में रखा। यह एक स्वर्गीय स्थल था
जहां हर प्रकार की सुन्दरता और आनंद भरा हुआ था। एक तरफ जहाँ परमेश्वर अपनी
मोहब्बत प्रकट कर रहा था, वहीं दूसरी और लूसिफर हमेशा उसकी
सृष्टि के खिलाफ अपनी चाले चलने की कोशिश करता रहा| यह व्ही लूसिफ़ेर है जो एक वक़्त
परमेश्वर का श्रेष्ठ स्वर्गदूत के तौर पर उस महान परमेश्वर के समुख उपस्थित हुआ
करता था, जो अनेक विशेषताओं से सुसजित था, लेकिन अपने अभिमान
एवं इर्ष्या के चलते परमेश्वर के खिलाफ बलवा कर बैठा | उसकी परमेश्वर के तुल्य
होने की लालसा ने उसको हमेशा के लिए परमेश्वर का दुश्मन बना दिया, और परिणामस्वरूप परमेश्वर ने हमेशा के लिए उसे स्वर्ग से इस पातल में
फेंक दिया| जिस दिन
से वो निचे गिराया गया है, उसी दिन से वो परमेश्वर के खिलाफ
काम करना शुरू किया, लेकिन कभी अपनी प्रयासों में सफल न हो सका | और उसने अब अपने
जाल में परमेश्वर की सबसे बड़ी सृष्टी को फंसना शुरू किया, और अपनी पराजयों के
बावजूद उसने हम इंसानों को अपने जाल में फंसा लिया | एक दिन, आदम और हव्वा ने, शैतान के बहकावे मे आकर परमेश्वर
की आज्ञा का उल्लंघन किया, जिससे पाप और मृत्यु संसार में
उत्पन्न हुए। इस एक गलती की वजह से पूरी कायनात, जिसे
परमेश्वर ने सुंदरता एवं पूर्णता से सृजित किया था, पाप के
गिरफ्त में आ गई। पाप अब लोगों के जहन में इस कदर समा गया, मानो वह उनकी फितरत का हिस्सा बन गया हो। यह पाप मानव जाति को एक ऐसे
चक्रव्यूह में फंसा ले गया, जिसे भेद पाना अब मनुष्य के लिए
असंभव सा हो गया था। इंसान ऐसी अदृश्य बेड़ियों से जकड़ गया, जिन्हें खोलना तो दूर, महसूस करना भी मुश्किल था,
लेकिन ये बेड़ियां हर दिन और मजबूत होती जा रही थीं। पाप का पिता,
शैतान, अपनी चालों में सफल होता देख प्रसन्न
होता गया, और इंसान अनजाने में उसके छल को पूरा करने में लगा
रहा। पाप की लहरे मानव जाती को बहा ले जाती गई, परमेश्वर से
दूर एक ऐसी गहराई में ले जाकर पटक दिया, जहाँ अन्धकार ही
अन्धकार, किसी प्रकार की रौशनी नही| परमेश्वर की वो सुंदर
रचना वीरानता में बदलने लगी |
लेकिन
परमेश्वर की मोहब्बत अद्वितीय थी। वह हर पीढ़ी में एक धर्मी इंसान की तलाश करता
रहा, जिससे वह बात कर सकें और लोगों को इस पापमय सागर से
निकाल सकें। परमेश्वर ने उन्ही में से एक धर्मी इंसान को, अर्थार्थ
अब्राहम को एक महान राष्ट्र का पिता बनने के लिए चुना। उसने अब्राहम से वादा किया
कि उसका वंशज महान होगा और कनान की भूमि प्राप्त करेगा । अब्राहम के पुत्र इसहाक
और पोते याकूब ने इस वाचा को जारी रखा। याकूब, जो
इस्राएल भी कहलाता था, के बारह पुत्र थे, जिनके वंशजों ने इस्राएल के बारह गोत्रों का गठन किया।इस प्रकार, परमेश्वर की मोहब्बत और वादों की यह अद्भुत गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही,
और इस्राएल के लोगों के माध्यम से परमेश्वर की महिमा और उनके अद्भुत
कार्य प्रकट होते रहे।
एक तरफ
जहाँ इंसान शैतान के चंगुल में फंसता जा रहा था, वहीं
परमेश्वर अपनी बड़ी सामर्थ्य और मोहब्बत के बहाव में अपने लोगों को हर बंधन से
आज़ाद करता जा रहा था। अनेक चमत्कारी संकेतों के माध्यम से, जिसमें
लाल सागर का विभाजन करना, जंगल के रास्तों में भूख और प्यास के
बीच भी, वह अपने लोगों की अगुवाई करता गया। वह रहीम खुदा बस
इतना चाहता था कि उसके लोग उसकी उपासना करें, उससे मोहब्बत
करें, और उसके साथ रहें।
हर
वक़्त, राष्ट्र और काल पर विजय दिलाने के बावजूद,
इंसान उस सिरजनहार परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्यता में संघर्ष करते
रहा और मूर्तिपूजा की ओर मुड़ते रहा। लेकिन वह अनुग्रहकारी परमेश्वर इतने बेवफाई
के बावजूद वफादार रहा। इंसान पाप करता, परमेश्वर उसे सजा
देता; वे पछतावा करते, परमेश्वर उन्हें
उनके दुश्मनों से आज़ाद करता। आज़ादी के बाद वे फिर पाप करते, और यूँ ही दुनिया पाप और पश्चाताप के चक्रों का अनुभव करती रही।
परमेश्वर
ने अनेक भविष्यवक्ताओं, नबियों और राजाओं के जरिये लोगों को अपनी
ओर लौटने का आह्वान किया। चेतावनियों के बावजूद, इंसान पाप
की ओर खिंचता चला गया। परमेश्वर कभी यहोवा राफा बनकर उनके सामने आता था, कि "मैं तुम्हें चंगा करने वाला परमेश्वर हूँ";
कभी यहोवा निस्सी बनकर उन्हें विजयी रथ पर चढ़ाता कभी यहोवा शलोम
बनकर शांति की बात करता और कभी यहोवा शम्मा बनकर हमेशा साथ रहने का वादा करता।
लेकिन उस सच्ची मोहब्बत को इंसान कभी नहीं देख पाया, और हर
बार दुनिया की चकाचौंध उस परमेश्वर की मोहब्बत को धुंधली करती रही। इंसान शैतान के
कब्जे में फंसता चला गया और अपने सच्चे खुदा से दूर होता चला गया। अन्धकार, शैतान, अधिकारों के मध्य निसहाय दुनिया
बेल्कश्य भटकने लगी, लेकिन एक बार भी उन्होंने अपने सच्चे पिता को जिसने उन्हें
बनाया था , याद नहीं किया| इंसानों की आँखे अब हमेशा उस
शितान की और लगी रही, जो अपनी चकाचौंध में इस दुनिया का
सत्यानाश करता गया|
अनेक
संघर्षों के बावजूद, इंसान परमेश्वर के साथ अपनी वाचा संबंध
को पुनः स्थापित करने में नाकाम रहा। आखिर में, वह रहीम खुदा
एक महत्वपूर्ण निर्णय लेता है। वह एलोहिम परमेश्वर, इम्मानुयल
बनकर इस दुनिया में आता है, ताकि इस संसार को पाप से बचाया
जा सके। अपनी मेहनत, अपने स्वरूप, अपनी
सांस को बचाने के लिए, वह पवित्र परमेश्वर इस पापी दुनिया
में हम इंसानों के बीच आ जाता है।
जैसा
की युहन्ना 3:16 कहता है की "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे
दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।"
हम
इंसानों के मध्य रहते हुए, यीशु परमेश्वर के राज्य के बारे में
सिखाता गया। अनेक चमत्कार कर कर के, और लोगों को शैतान के
बंधन से आज़ाद करता रहा। वह लोगों को पश्चाताप के लिए बुलाता था, अंधों को आंखें देता था लंगड़ों को चलाता था, मृतकों
में जिंदगी भरता, गिरे हुओ को संभालता, था। घूरे से उठा कर उसने हमे फिर से खड़ा किया, गम के
आंसू पोंछ कर फिर से मुस्कुराने का मोका देता रहा | इस अंधेरे मे एक ज्योति चमकी
थी, एक आस जगी थी | जितनों ने उसे
ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार
दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।"
हम इंसानो को पाप और श्राप से मुक्त करते हुए, वह परमेश्वर का मेमना पूरी दुनिया के पापों और बीमारियों को भार अपने ऊपर
लेता चला गया। लेकिन फिर भी इंसान इस ज्योति को अपने नजदीक होने के बावजूद पहचान
नहीं पाया, उसे ग्रहण नही कर पाए, और उसके अपने ही लोगों ने उसके साथ विश्वासघात करके उसे क्रूस पर चढ़ा
दिया।
(यशायह 53)
वह तुच्छ जाना गया, त्यागा हुआ समझा गया,
उस ने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया,
वह हमारे ही अपराधो के कारण घायल किया गया, वह
हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के
लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएं। हम तो सब के सब
भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना
मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद
दिया।। वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला;
जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय वा भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप
शान्त रहती है, वैसे ही उस ने भी अपना मुंह न खोला, अत्याचार करके और दोष लगाकर वे उसे ले गए; उस समय के
लोगों में से किस ने इस पर ध्यान दिया कि वह जीवतों के बीच में से उठा लिया गया?
मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी। उसने कोई पाप नही
किया था, उसने तो कभी पाप को जाना ही नहीं था, तौभी यहोवा को यही भाया कि उसे कुचले, की उसकी
मृत्यु से हम इंसान शैतान से, पाप से, बीमारी
से, हर तकलीफ से आज़ाद हो जाए | हम तो
पापी ही थे, जब उसने हम से मोहब्बत की | (Roman 6:23)
क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु
परमेश्वर का बरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है | हमारी मौत की सज़ा, वो अपने उपर ले गया, और उस क्रूस पर अपनी बाह फेला कर हम इंसानो को अपने पास बुलाता और
पर्मेशवर् की मोहब्बत से उसने हमे फिर जोड़ दिया |
सोचिए, वह परमेश्वर होने के बावजूद अपनी अनमोल मोहब्बत के कारण खुद को शून्य बना
गया, और इतना आज्ञाकारी बना कि उसने क्रूस पर मृत्यु को भी
सहन किया। उसके पहले कदम ने इस दुनिया में शैतान के अधिकार को तोड़ डाला था और
शैतान की जंजीरों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था । उसने हजारों जन्म नहीं लिए,
लेकिन उसका एक जन्म भी हजारों जन्मों से कम नहीं था। वह पवित्र
परमेश्वर अपना पवित्र स्वर्ग छोड़कर इस पापी दुनिया में आया, अपना पवित्र सिंहासन छोड़कर एक साधारण गोशाले में जन्म लिया। उसने अपना
पवित्र मुकुट छोड़कर कांटों का मुकुट सिर पर धारण किया, और
वह दर्द सहता है सिर्फ मेरे और आपके लिए, हम इंसानों के लिए।
यीशु
की मृत्यु के तीन दिन बाद, वह मृतकों में से जी उठा, अपनी दिव्य प्रकृति को साबित करते हुए और पाप और मृत्यु पर विजय प्राप्त
उसने की। इंसान के सबसे बड़ा डर अर्थार्थ मृत्यु को उसने हारा दिया | कब्र उसको रोक नही सकी, मृत्यु उसको थाम नही सकी,
वो फिर जी उठा, उसने शैतान के सिर को अपनी
सामर्थ से कुचल दिया| यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि
परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी दी थी। उसने अपना लहू देकर हमे
मोल लिया है,
जहाँ एक वक्त
परमेश्वर ने शैतान के सिर को कुचल दिया था, आज उसने यीशु में
हमें भी यह अधिकार दे दिया है कि हम शैतान की सामर्थ्य पर शासन करें। जहाँ एक वक्त
मृत्यु ने संसार को जीत लिया था, आज उसी यीशु ने पुनः जीवन
ग्रहण कर उसे केवल नाममात्र का बना दिया। जहाँ परमेश्वर ने पाप का फल मृत्यु
निर्धारित किया था, आज यीशु में उसने अनंत जीवन का मार्ग
खोला। आज वह शैतान, जो कभी परमेश्वर और उसकी सृष्टि के बीच
में आ खड़ा हुआ था, अब नहीं आ पाया, क्योंकि
यीशु की कुर्बानी ने हमें, अपवित्र इंसानों को, फिर से उस महान और पवित्र परमेश्वर से जोड़ दिया।
स्मरण करे,
परमेश्वर ने आदि में हमे चार चीज़े दी – अपनी मेहनत, अपना स्वरूप, अपनी साँसे और अधिकार |
पाप ने हम से
सर्वप्रथम हमारा अधिकार छीना और इस दुनिया पर राज्य करने लगा| वक़्त के साथ हमने उस
परमेश्वर का स्वरुप जो महिमामय था, उसे भी पाप के कारन
खो दिया | हमने पाप को यूँ अपनाया की हमारी हर स्वांसो में शैतान विराजमान था| हमारा मन उस परमेश्वर की मेहनत को भूल बैठा और शैतान को प्रभु के तौर पर
पुकारने लगा| मेरे दोस्तों, पाप दुनिया को उस सच्चे पिता से,
उस रहीम खुदा से बहुत दूर ले गया जहाँ से लौट पाना हमरे बस की बात नही थी | लेकिन
वो मोहब्बत करने वाला परमेश्वर अपनी सृष्टी को, अपनी मेहनत, अपने स्वरुप के प्रति तड़प उठा, वो नहीं चाहता की
उसकी बने कोई भी सृष्टी नाश हो | उसने सही वक़्त पर अपने पुत्र को भेज दिया इस पाप
के सागर में, हमने तो सबने अपना अपना मार्ग ले लिया था,
लेकिन वो सच में हमसे बहुत प्रेम करता रहा | यीशु ने हम सभी का पाप अपने उपर लेकर
उस क्रूस पर कुर्बान हो गया | जब दुनिया उस पर हंस रही थी,
तब वो उस क्रूस पर अपनी बाहें खोल सभी को अपनी तरफ बुला रहा था | वो हमारे लिए
दर्द सह गया | सच में उसकी इस कुर्बानी ने फिर से हमारी स्वांसो को, हमारे स्वरुप को उस परमेश्वर के प्रतिबिम्ब कर दिया | और वो अधिकार जो हम
से छीन लिया गया था, यीशु के उन वचनों में फिर से पूर्ण होता
है जो उसने कहे जब वो स्वर्ग में उठाया जा रहा था “की स्वर्ग और पृथ्वी का सारा
अधिकार मुझे दिया गया है” और उसने हमसे हमेशा साथ रहने का वादा किया|
यीशु
का जीवन और उनकी शिक्षाएं इंसानियत को एक नई दिशा प्रदान करती हैं। अपने प्रेम, दया और क्षमा के संदेश के माध्यम से, उसने यह स्पष्ट
किया कि परमेश्वर की मोहब्बत हर इंसान के लिए उपलब्ध है, चाहे
वह कितना भी पापी क्यों न हो। पर्मेश्वर् का वचन जिस तरह कहता है की तुम्हारे पाप
चाहे लाल रंग के हों, तौभी वे हिम के समान श्वेत हो जायेंगे;
और चाहे वे अर्गवान रंग के हों, तौभी वे ऊन के
समान श्वेत हो जायेंगे, यीशु ने दिखाया कि परमेश्वर का राज्य
केवल बाहरी दिखावे या अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि सच्चे दिल
से परमेश्वर की सेवा और उसकी शिक्षाओं का पालन करने से आता है। उसका पुनरुत्थान इस बात का प्रमाण है कि अब मृत्यु का कोई भय
नहीं है, है मृत्यु तेरी जय कहाँ रही??
है कब्र तेरी सामर्थ कहा है?? यह मानवता
के लिए आशा और नई जिंदगी का संदेश है। यीशु का बलिदान और पुनरुत्थान यह दर्शाता है
कि परमेश्वर की मोहब्बत अनंत और अटूट है, और वह अपने लोगों
को कभी नहीं छोड़ता, इतना ही नहीं, एक
बड़ी आशा जो उसने हमे दी, ये कुछ दिन के क्लेश, निराशाओ के बाद, एक नया सवेरा होगा, एक नई दुनिया होगी, जहाँ कष्ट ना होगा आँसू नही
होंगे, क्यों की वो रहीम खुदा हमे लेने को फिर से आयेगा,
हमे अपने पास ले जाने के लिए, हमेशा हम उसके
साथ रहेंगे, उसके होकर रहेंगे, और उसमे
रहेंगे |
जब दुनिया
पापियों को नष्ट करने की सोचती है, उस समय सच्चे
परमेश्वर ने उन पापियों से प्रेम किया। मार डालने से पाप का नाश नहीं किया जा सकता,
बल्कि उस परमेश्वर पर विश्वास करने से ही पाप से उद्धार प्राप्त
किया जा सकता है। आज दुनिया जब मूर्तियों में अपने परमेश्वर को खोजती है, तीर्थस्थलों में परमेश्वर को ढूँढती है, तो मेरे पास
एक खुशखबरी है, मित्रों—मेरा परमेश्वर खुद मुझ पापी को
ढूँढने आया। उसने मेरे पापों को देखा, लेकिन मेरा नाश नहीं
किया। उसने मुझे खुद से दूर नहीं किया, बल्कि मुझे अपने गले
लगा लिया। उसने मुझसे मोहब्बत की।
मैं किसे
परमेश्वर कहूँ? उस मूर्ति को जो सिर्फ सृष्टि है, जो केवल आकार में मौजूद है? जिनकी आँखें हैं,
लेकिन वे देख नहीं सकते; जिनके कान हैं,
लेकिन वे सुन नहीं सकते; जो अपनी खुद की
सामर्थ से कुछ नहीं कर सकते और जो पापियों को देख नष्ट करते हैं? या मैं उस परमेश्वर से प्रेम करूँ, जिसने मुझे पापमय
कीचड़ में गिरा हुआ देखा और मुझसे दूरी नहीं बनाई, बल्कि
मुझे अपने कंधों पर उठा लिया? जिसने मुझे बदसूरत देखा,
फिर भी मुझसे नफरत नहीं की, बल्कि अपनी
खूबसूरती मुझे दे दी और खुद बदसूरत हो गया? जिसने मुझे नाश
नहीं किया, बल्कि अपनी मोहब्बत से मुझे भर दिया। जिसने मुझसे
कहा कि तू मेरा पुत्र है, और मुझे यह आश्वासन दिया कि तुझे
डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैं तेरा साथ देने के लिए
हमेशा हूँ।
निर्णय आपका है
!! क्या उचित है ? वक़्त कम है अब, वो खुदा फिर आने वाला है, हमे अपने साथ ले जाने को| सवाल है “हम उस दिन कहाँ होंगे?” कहीं देर न हो
जाएँ...
वो
हमेशा का परमेश्वर है, जो हमारे मांगने से पहले ही हमारी
जरूरतों को समझता है। वह हमें हमारे सोच से भी बेहतर चीजों से भरता है और हमारी
कल्पना के परे काम करता है। इसलिए, अपने जीवन को उसकी इच्छा
के अनुसार चलाएं और उसे प्रसन्न करें। याद रहे, प्राण देने
तक विश्वासी रह; तो वो तुझे जीवन का मुकुट देगा।”
लिखने के लिए
बहुत है उसकी मोहब्बत पर, मैं समझता हूँ अगर उसकी मोहब्बत पर लिखा जाए, तो पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी, लेकिन उसकी मोहब्बत
के किस्से कभी खत्म नहीं होंगे, और उसकी मोहब्बतकभी खत्म
नहीं होगी।
No qualifications are
needed.
No money needed,
No caste needed,
No partiality,
No priorities
In the realm of true love and grace,
none of these matters. What matters is the sincerity of the heart, the openness
of the soul, and the willingness to embrace the unconditional love that flows
from the Creator. He accepts us as we are, without judgment, without demand.
His love knows no barriers, no distinctions. It transcends all the conditions
we often place upon ourselves and others. In His eyes, we are all equal, all
worthy of His boundless compassion.
So, we don't need to worry about
what we lack or what we are, because His love sees beyond it all, offering us
peace, hope, and acceptance.
Endless Love of
Christ!!
Unconditional
Love of God!!
Best Love Story
Ever!!
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