“Safar-e-Iman”
“Safar-e-Iman”
MY
JOURNEY WITH JESUS AND HIS DISCIPLES
"Jahan
iman hai, wahan har manzil mumkin hai."
माँ – बेटा! कुछ
खाने को ले जाना आज |
मैं – मम्मी!
रहने दो, हमेशा की तरह ही मैं आज भी खाने को नहीं ले जा रहा हूँ |
माँ – बेटा, ले
जा ले, भूख लग जायेगी !
मैं – मम्मी! यह
तो जबरदस्ती है, मुझे नहीं चाहिए खाना |
माँ – बेटा,
मेरे खातिर ले जा ले तुझे भूख लगेगी तो खा लेना..सिर्फ 5 रोटियाँ और 2 मछलियाँ
ही तो रखी है |
यार! यह मम्मी
भी न, हमेशा तो मैं कुछ ले जाता नहीं हूँ.... लेकिन आज पता नही क्यूँ जबरदस्ती ले
जाने को बोल रही है |
अरे हाँ!! आपको
एक बात बताऊं... आज मैं यीशु को सुनने को उनके पास जा रहा हूँ, वैसे मैं एक छोटे से ढाबे पर गिलास बर्तन धोने का काम करता हूँ | महीने
के 500 रुपये मिल जाते है, हम गरीबो का अर्थार्थ मैं और मेरी बीमार माता जी का
गुज़ारा उसी से चलता है | उनमे से भी आधे रुपये तो माँ की दवाइयों में चले जाते है|
इसीलिए ही तो मैं बगैर खाने के ही काम पर चला जाता हूँ | आज पता नही क्यूँ माँ ने
जबरदस्ती खाना पकडवा दिया है, खेर ले जाना पड़ रहा है अब
तो.... क्या करे ...माँ तो माँ होती है न... मैं नही ले जाऊँगा तो खुद भी नहीं
खाएगी......
मैं बाकी लोगो
के साथ निकल पड़ा यीशु के पास जाने को | हम सभी बहुत खुश थे.... लेकिन फिर हमे
बताया गया की यीशु तो नाव पर सवार होकर कोई सुनसान जगह पर चले गए है | हाँ! कुछ
देर निराशा ने हमे आ पकड़ा था, लेकिन जल्द ही हम सभी ने निश्चय किया की हम यीशु के
पास जाएंगे, इसीलिए हम सभी पैदल ही यीशु के पास जाने को निकल पड़े |
यीशु जब नदी के
उस पार उतरा और हमे अर्थार्थ इतनी बड़ी भीड़ को देख कर तरस खाया, बहुत दूर तक हम
सिर्फ यीशु से ही मिलने आये थे, उन्हें सुनने आये थे
| यीशु ने हमसे अनेक बातें की, परमेश्वर के राज्य की बातें बताई | मैं तो बहुत
दिनों से यीशु को सुनना चाहता था और आज मेरा यह सपना अच् होता देख मैं बहुत खुश था
| उन्होंने हम में से अनेक बीमारों को चंगा किया, जो न जाने कितने वैद्यो के पास
जा चुके थे | मैं यीशु के नजदीक ही बैठा हुआ उनका वचन सुन रहा था एवं उन बड़े
आश्चर्य कर्मो को देख रहा था, जो यीशु के हाथों से हो रहे थे
| सुबह से शाम तक हम यीशु को सुनते रहे और वो हमे अपने वचनों से बहुत ज्ञान की
बातें सिखाते रहे |
जब सांझ हुई तो
मैंने देखा की यीशु और उनके चेले आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे है | मैं नजदीक
बैठे होने के कारण मैंने सुना की चेले यीशु से कह रहे थे की “इनको अब विदा कर की
यह लोग पास की बस्तियों में जाकर अपने लिए कुछ भोजन मोल ले” लेकिन यीशु ने अपने
चेलो को जवाब दिया की “तुम ही इन्हें कुछ खाने को दो” | चेले थोडा हैरान थे की इस
जंगल मैं कहाँ से खाने को ढूँढा जाए इतने लोगो के लिए, खेर यीशु ने कहा है तो वो ढूंढना शुरू क देते है |
मैं यह सब बातें
सुन रहा था और जब मैंने यह सुना तो यीशु के एक चेले के पास जाकर कहा की “मेरे पास
5 रोटियाँ और 2 मछलियाँ है, मेरी माँ ने बड़े
प्यार से बनाकर दी थी मुझे, मुझे पता है यह बहुत कम है,
लेकिन कम से कम यीशु के लिए तो काफी होगी, उनको तो दे दिया
जाएँ खाने को |
उन्होंने यीशु
को जाकर बताया की उन्हें इतने लोगो के खाने के लिए तो कुछ मिला नहीं, लेकिन एक लड़का मिला है जिसके पास 5 रोटियाँ और 2 मछलियाँ है | तब यीशु ने
अपने चेलो से कहा की उन रोटियों और मछलियों को मेरे पास ले आओ | यीशु की बात मान
कर उनके चेले उन्हें मेरे पास से ले गये |
मैं खुश था की
यीशु मान गये है, यीशु को खाने को मिल
गया, काफी था मेरे लिए | मुझे नही पता था आगे क्या होने वाला
बस वक़्त गुजरता रहा | कुछ देर बाद मैंने यीशु को मेरी उन 5 रोटियों और 2 मछलियों
के साथ देखा | मैं देखना चाहता था की यीशु मेरी उन रोटियों और मछलियों के साथ क्या
करते है |
और मैंने देखा
की वो प्रार्थना करके उन रोटियों की टोकरी को अपने चेले पतरस को दे देते है, की
लोगो में बाँट दो| अब मेरी नज़र पतरस पर
थी, वो अब उस टोकरी को लेकर जिसमे 5 रोतिआं और 2 मछलियाँ थी, लोगो की भीड़ के सामने
खड़े थे | उन्होंने रोटियाँ बांटनी शुरू की...... 1,2,3,4, और 5,....... पूरी हो गई..... चमत्कार यहाँ नही हुआ था दोस्तों, चमत्कार वहां
हुआ.... जब 6,7,8,.... करते हुए लोगो के हाथों में मुझे रोटियाँ नज़र आने लगी | मुझे विश्वास
नही हुआ, एक पल के लिए मैं सुना सा हो गया | मैंने पतरस के पास जाकर देखा.... ऐ
खुदा....5 रोटियाँ और 2 मछलियाँ सच में इतनी सारे में बदल गए और हर हाथों में
पहुँचने लगे | मैं भी यीशु के पास गया, और उनसे एक टोकरी लेकर, लोगो को बांटना शुरू कर दिया | और यह क्या.... वाह! यीशु की प्रार्थना से
मेरे हाथ भी चमत्कार करने लग गये थे ..... वाह! क्या खूबसूरत अनुभव मैं जी रहा था
|
मुझे अब समझ आ
रहा था की हर दिन मैं खाना लेकर घर से नहीं निकलता था, लेकिन आज मेरी माँ ने जबरदस्ती खाना भिजवाया था,
मतलब परमेश्वर ने पहले से ही आज के चमत्कार के लिए मेरी माँ से तैयारी करवा ली थी
| 5 रोटियाँ और 5000 आदमी उफ्फ.... | 1 टोकरी से परमेश्वर ने ऐसा काम किया की १२
टोकरियाँ बाकी रह गई | सच में परमेश्वर देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है, बहुतायत से देता है | सच में यीशु बहुत सामर्थी है |
फिर यीशु ने
अपने चेलो को आदेश दिया की वो नदी के उस पार चले जाएँ.... खुश था मैं, क्यूँ की आज मैं भी उनके साथ जाने वाला था | और यार इतना तो बनता है
आज....रोटियाँ लेकर आया था....इतना हक बनता है |
हम नाव पर सवार
हो गए, यह मेरा पहला सफ़र था नाव पर, वो
भी यीशु के चेलो के साथ... लेकिन यीशु साथ नही थे, | हम सभी
खुश थे, क्यूंकि अभी थोड़ी देर पहले हमारे हाथों से चमत्कार
जो हुए थे |
मैं तो दुगुना
तिगुना खुश था, एक तो मेरे हाथों से भी चमत्कार
हुए थे, और फिर रोटियाँ मैं ही तो लाया था | मुझे अपने आप पर
गर्व हो रहा था, मेरा सीना चोडा हो रखा था | मैं बार बार उन
१२ टोकरियों को देख रहा था, जो यीशु के चमत्कार थे, और
उन्हें देख मन ही मन बहुत खुश हो रहा था |
वक़्त धीरे-धीरे
बीतता गया, और अब हमारी नाव झील के ठीक
बीचो-बीच पहुँच चुकी थी। सूरज डूबने को था, शाम गहराने लगी
थी, और अंधेरा धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगा। हमारे चारों
तरफ केवल पानी ही पानी था, और उस सन्नाटे भरे माहौल के बीच
हम सब नाव पर सवार थे।
मुझे किसी चीज़
की फ़िक्र नहीं थी, न ही कोई डर। और डरता
भी क्यों? हमारे पास तो 12 टोकरियाँ
थीं, जो यीशु के चमत्कार का जीता-जागता प्रमाण थीं। उन
चमत्कारों पर मुझे गर्व महसूस हो रहा था। मन में यह ख्याल बार-बार आ रहा था कि जब
हमारे साथ यीशु के अद्भुत कार्यों की निशानियाँ हैं, तो हमें
किस बात का डर?
फिर, यीशु के चेले भी तो हमारे साथ थे। उनका साथ पाकर मेरा आत्मविश्वास और बढ़
गया था। मुझे यकीन था कि जब तक वे हमारे साथ हैं, कोई भी
मुसीबत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। सच कहूँ तो, मैं अपनी
सुरक्षा को लेकर पूरी तरह निश्चिंत था... शायद जरूरत से ज्यादा।
लेकिन अचानक, झील ने अपना शांत और सौम्य रूप को ओझल कर और मानो एक भयंकर और विकराल
समुद्र का रूप धारण कर लिया। ऊँची-ऊँची लहरें बेकाबू हो कर उठने लगीं, और उनके तेज़ थपेड़ों ने हमें पूरी तरह से घेर लिया। लहरों की गिरफ्त में
हमारी नाव पूरी तरह अस्थिर और डगमगाती सी, पानी के बहाव में
बहने लगी थी |
अब हमारी नाव
में बैठे वो चार मशहूर और प्रतिभाशाली मछुआरे खड़े हो गए। हाँ, अब मेरी नज़र उन्हीं पर थी। वे अपनी-अपनी कुशलता और अनुभव का पूरा प्रयोग
कर हमारी नाव को काबू में करने की कोशिश करने लगे। यह वही मछुआरे थे जिनके बारे
में कहा जाता था कि दुनिया में ऐसी कोई नाव नहीं बनी जिसे वे नियंत्रित न कर सकें।
लेकिन... यह क्या हो रहा है? वे हरसंभव कोशिश कर रहे थे,
पर हर बार असफल हो रहे थे। उनकी महारथ, उनका
जादू, जो हमेशा काम करता था, आज बेअसर
साबित हो रहा था। उनकी ताकत और अनुभव, जो कभी चुनौती को
हारने नहीं देते थे, आज लहरों के आगे बौने पड़ रहे थे।
मेरी यह पहली
वजह थी कि मैं आज नाव पर बगैर किसी डर के बैठा हुआ था। क्योंकि मुझे पूरा विश्वास
था कि यीशु मसीह के चेलों में कुछ बेहद प्रतिभाशाली मछुआरे भी थे, जो हर तरह की चुनौतियों का सामना कर सकते थे। लेकिन जैसे-जैसे हालात
बिगड़ने लगे और उनके प्रयास विफल होते गए, मेरा भरोसा उन पर
से उठने लगा। अब मेरे अंदर डर पनपने लगा था। मेरा ध्यान बार-बार यीशु पर जा रहा
था। मैं उन्हें ढूँढने के लिए इधर-उधर नजरें घुमाने लगा। तभी, मेरी निगाह अचानक उन चमत्कारी टोकरियों पर पड़ी, जिनमें
से हर एक यीशु के अद्भुत कार्यों की गवाही देती थी। उन टोकरियों को देखकर मेरे दिल
को थोड़ा सुकून मिला। मेरा डगमगाता विश्वास फिर से मजबूत होने लगा। मैंने उन
टोकरियों पर अपनी नजरें टिकाए रखीं, जैसे वे ही मेरी सुरक्षा
की आखिरी उम्मीद थीं। लेकिन अचानक... उनमें से एक टोकरी पानी में गिर गई! मैं
घबराकर चिल्लाया, “अरे! वो टोकरी गिर गई पानी में!” मेरी दूसरी वजह भी, जिसके चलते मैं नाव पर निर्भीक
बैठा था—यीशु की चमत्कारी टोकरियाँ ही थी । मैंने सोचा, "अगर ये चमत्कारी
टोकरियाँ खुद को नहीं बचा सकतीं, तो हमें क्या ही बचाएंगी?" और इसी तरह, मेरा दूसरा भरोसा, अर्थात यीशु के चमत्कारिक कार्यों का प्रतीक—टोकरियों पर से भी उठ गया। और
फिर से... डर ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया।
तूफ़ान थमने का
नाम ही नहीं ले रहा था, बल्कि समय के साथ और
भी विकराल होता जा रहा था। लहरें अब और ऊँची उठने लगी थीं, उनकी
गड़गड़ाहट कानों में गूँज रही थी, और उनकी ताकत नाव को एक
खिलौने की तरह इधर-उधर फेंक रही थी। मुझे सच में बहुत डर लग रहा था। यह डर केवल
तूफ़ान का नहीं था, बल्कि उस अजनबी अनुभव का भी था, क्योंकि यह मेरी ज़िंदगी का पहला मौका था जब मैं नाव पर सवार हुआ था। और
अब ऐसा महसूस हो रहा था कि यह पहली बार मेरी ज़िंदगी का आखिरी बार बनने वाला है।
मेरे भीतर अनगिनत ख्याल उमड़-घुमड़ रहे थे—क्या मैं अब अपनी माँ को कभी नहीं देख
पाऊँगा? क्या यह तूफ़ान हमारी नाव को पूरी तरह डूबो देगा?
ऐसा लग रहा था कि जीवन की हर आशा अब मुझसे छूटती जा रही है। सोच रहे
हो?.. यह अँधेरी रात, चारों तरफ फैला
गहरा सन्नाटा, और पानी की गर्जनो का यह असहनीय शोर। लहरों का
उफान ऐसा मानो वे आकाश तक पहुँचने को आतुर हों, और
हम—बेसहारे, हताश, एक अनजान दिशा में
भटकते मुसाफिर....उफ्फ्फ.....|
इसी बीच, अचानक मेरी नज़र पीछे की ओर मुड़ी। मैंने देखा कि कोई व्यक्ति झील की
विकरालता को चीरते हुए, पानी के ऊपर चल रहा था। पहली बार में
मुझे लगा कि शायद यह तनाव के कारण मेरी आँखों के सामने कोई खयाल बन गया है। दिमाग
में कई अजीब और डरावने विचार आ रहे थे, तो मैंने सोचा कि
शायद यह मेरी कल्पना है। लेकिन फिर मैंने घूम कर थोडा गौर से देखा .... अरे! यह तो
सच में कोई झील पर चलता हुआ, हमारी ओर आ रहा था | सच में भाई
मैं डर गया, मैं सबसे पहले चिलाया “ यह तो भूत है, भूत !! मैं खुद भी नहीं समझ पा
रहा था कि यह क्या हो रहा था, लेकिन उस अजीब और अविश्वसनीय
दृश्य ने मुझे पूरी तरह से घेर लिया था। वह शख्स, जो पानी के ऊपर चल रहा था,
अब मुझे सच में डराने लगा था।
चेलो ने मेरी
आवाज़ सुनकर पीछे मुड़ कर देखा, चेलो में थोडा सा बचा कूचा जो विश्वास था प्रभु
पर.... उसे भी मैंने भूत के नाम से खत्म कर दिया.... और अब मेरे पीछे से भूत! भूत!
की आवाज़े आने लगी | मैंने चौंककर फिर पीछे मुड़कर देखा... अरे! यह क्या? यीशु के चेले भी डरकर मेरे साथ, "भूत! भूत!" चिल्ला रहे थे। यह दृश्य मेरे लिए पूरी तरह से असमंजस में डालने वाला था।
मैं सोच रहा था, क्या ये वही चेलें हैं जो यीशु के साथ रहते हैं, जिन्होंने कभी किसी
से डर का सामना नहीं किया था?
और यह थी मेरी
तीसरी वजह की क्यों आज में नाव पर बगिर किसी डर के बैठा हुआ था | क्यूंकि मुझे
यीशु के चेलो पर भरोसा था, की वो किसी से नही डरते है, यार यीशु मसीह के साथ रहते
है... उनके लिए तो डर क्या ही चीज़ होती है | लेकिन यहाँ तो यह भी मेरे साथ चिल्ला
रहे थे, मेरा भरोसा अब यीशु के चेलो पर से भी उठ गया था | और फिर से मैं डर के
गिरफ्त में ... अब हम सब मिलकर चिल्ला रहे थे भूत! भूत!
लेकिन इन
आँधियों और तूफानों को चीरती हुई एक धीमी आवाज़ हमारे पास पहुँचती है की “डरो मत!
मैं हूँ” | सोच रहे है हवा और लहरों के शोर के बावजूद, यह आवाज़ इतनी स्पष्ट और सजीव थी कि कोई भी इसे अनसुना नहीं कर सकता था।
चेलों को वह आवाज़
सुनकर थोड़ी राहत मिली की यह यीशु है । उन्होंने सुकून की पहली सांस ली ही थी कि
मैंने बोल दिया, “हम कैसे मान लें कि यह यीशु ही हैं? उन्होंने अपना नाम तो नहीं बताया! और चलो, अगर मान
भी लें कि यह अपना नाम बता दें, तो भी हम यह कैसे विश्वास कर
सकते हैं?” मेरे इतना कहते ही चेलों की साँसें, जो अभी-अभी स्थिर हुई थीं, फिर से अटक गईं। वे एक
बार फिर घबराने लगे। मैं जानता हूँ कि मैं डरपोक हूँ, लेकिन
सच कहूँ तो यह सब मैं जान-बूझकर नहीं कर रहा था। यह परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने मुझे पूरी तरह से घेर लिया था। डर ने मेरे मन और सोच को इस कदर
जकड़ लिया था कि मेरे दिमाग में ऐसे विचार अपने आप उठने लगे। मुझे यह भी समझ नहीं
आ रहा था कि मेरी बातों का चेलों पर कितना असर हो रहा था। मेरा डर न सिर्फ मेरा था,
बल्कि अब वह उन पर भी भारी पड़ रहा था। जैसे मैं उनके विश्वास को
कमजोर करने का जरिया बन गया था।
इसीलिए पतरस ने
उस शक्स से कहा की “हे यीशु अगर यह आप है तो मुझे भी पानी पर चलने की आगया दे”
बाकी सब चुपचाप
बैठ कर यह वार्तालाप सुन रहे थे, लेकिन... आप भूल गए मुझे..? मैं भी हूँ वह !
मैंने पतरस से कहा “ “आप यह क्या कह रहे हैं?
आप एक साधारण इंसान हैं। आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? हाँ, मान लिया कि आप एक कुशल मछुआरे हैं, लेकिन इसका मतलब यह थोड़ी न है कि आप पानी पर चल सकते हैं! आप तो जानते
हैं कि पानी पर कोई नहीं चल सकता। पानी हर किसी को डुबा देता है। फिर आप ऐसा
बेवकूफी भरा विचार कैसे कर सकते हैं? यह कोई भूत है, भूत! आप इंसान हैं, और इंसान और भूत में फर्क होता
है। इसे समझने की कोशिश कीजिए।”लेकिन मेरी बात खत्म भी नही हुई थी की उस इन्सान ने
पतरस को अपने पास चल कर आने की आज्ञा दे दी| और पतरस की
आँखों में अचानक से एक नया विश्वास चमकने लगा। उसकी झिझक, जो
अब तक उसे रोक रही थी, जैसे उस बुलाहट ने अदम्य साहस और अटूट
भरोसे में बदल दिया |
मैंने फिर अपनी घबराई
हुई आवाज़ में कहा, "मत जाओ! आप डूब जाओगे। वो कोई
इंसान नहीं, भूत है! और आप... आप तो एक साधारण इंसान हैं।
पानी पर कोई इंसान नहीं चल सकता!" मेरे शब्दों में डर, संशय और बेबसी का तूफान साफ झलक रहा
था। पता नहीं आज मुझे क्या हो गया था। जैसे हर बार जब विश्वास का दिया जलता,
मैं उसे अपनी शंकाओं की आंधी से बुझा देता।
लेकिन इस बार पतरस ने
मेरी ओर देखा और शांत और दृढ़ आवाज़ में कहा, “आशीष!
इन टोकरियों को देख रहे हो? सोचो, यह
सब कैसे हुआ? क्या एक साधारण इंसान यह सब कर सकता है?
क्या हमारे इन साधारण हाथों ने अपने बल पर यह चमत्कार किया?” मैं उसकी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया। उसने आगे कहा, “नहीं, कोई इंसान यह सब नहीं कर सकता। लेकिन अगर यह
हुआ है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि यीशु ने इसे संभव किया। उनके
कहने से ही असंभव चीज़ें भी संभव बनती हैं।” अगर यीशु हमें कोई काम करने को कह
देते हैं, तो फिर कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती। चाहे वह
कितना भी कठिन या असंभव क्यों न लगे। अगर उन्होंने मुझे बुलाया है, तो इसका मतलब है कि मैं यह कर सकता हूँ। क्योंकि उनके शब्द में ही
सामर्थ्य है, उनके वचनों में ही चमत्कार छिपा है।” उसकी
बातों ने जैसे मेरे भीतर उठ रहे डर और संशय के तूफान को कुछ पल के लिए थाम दिया।
लेकिन फिर भी, मेरे मन में सवालों की लहरें उठ रही थीं।
वो नही माने, उन्होंने अपने पूरे भरोसे के साथ नाव से बाहर कदम रखा। पानी पर पैर
रखते ही मैं हैरान रह गया। पतरस सच में डूबे बिना पानी पर खड़े थे! वो अपने खुदा पर भरोसा रख कर, अपने
बुलाने वाले की ही ओर देखते हुए धीरे धीरे कुछ कदम बढ़ने लग गए थे | उनकी नज़र सिर्फ
यीशु पर टिक्की रही , और मेरी पतरस “यह कैसे संभव था ?
किन्तु अचानक, पतरस की दृष्टि यीशु से हटकर उन
विशाल लहरों पर जा टिकी, जो मानो आकाश को छूने को आतुर थीं।
उन लहरों की गर्जना, उनका भयंकर स्वरूप, और उनकी उठान ने पतरस के हृदय में छिपे भय को जीवित कर दिया। वह भय,
जो अब तक उनके विश्वास की छाया में था, अचानक
जाग उठा। पतरस की आँखों में संशय की हलचल साफ झलकने लगी। जैसे ही उनका ध्यान अपने
बुलाने वाले से हटकर उन विकराल लहरों पर केंद्रित हुआ, उनके
विश्वास का दीप मंद पड़ने लगा। हृदय की थरथराहट ने उनके कदमों को अस्थिर कर दिया। जल ने अपनी पकड़ बढ़ाई,
और पतरस उस खतरनाक जलधारा में धीरे-धीरे डूबने लगे।
भूलिए नही! पतरस एक मछूहारे थे, जिसे तैरने में महारथ
हासिल है | तैरना उनकी कला है, उनकी पहचान है | मैंने पतरस को आवाज़ दी की मुझे हाथ दो, आप दूर नही हो नाव से “ लेकिन आज पता नही क्या हो रहा था आज जो भी मैं
सोचता हूँ, बोलता हूँ सबकुछ उसके विपरीत होता रहा | क्यूँ की
आज वो तैराक तैर नही कर पा रहा था | यह वही पतरस था जिसके शब्दकोष में 'डूबना' जैसा कोई शब्द नहीं था। लेकिन आज, इन भयानक लहरों और उग्र आँधियों के मध्य, वह डूब रहा
था। उसकी हालत को देखकर यकीन करना मुश्किल था। यह पतरस, जो
बचपन से समुद्र और झीलों का दोस्त था, आज उसी जल में असहाय
लग रहा था। लेकिन सच यही था। डर और संशय ने उसकी ताकत को जैसे जकड़ लिया था। उसकी
तैराकी की महारथ, उसकी सारी क्षमताएँ मानो इन लहरों के
डरावने शोर में खो गई थीं। विश्वास की डोर जब छूटने लगती है, तो सबसे मजबूत इरादे भी धराशायी हो जाते हैं। यही तो हो रहा था।
पतरस ने घबराकर उन परिस्थियों के मध्य से अपने खुदा
को पुकारा उनकी आवाज़ में अब विश्वास का स्वर नहीं, बल्कि प्राण रक्षा की याचना थी।
चारों ओर जल का शोर और लहरों का कहर था, और उनके डूबते कदम,
उस क्षण की गहराई को और भी भयावह बना रहे थे। और उस शक्स अर्थार्थ
यीशु ने अपना हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने पास ऊपर ले लिया | और हम एक ऐसे खतरनाक सफ़र
को, अपने डगमागती अवस्थाओं को पार करते हुए, अपने गंतव्य तक पहुच्न्हे |
किन्तु तभी, उस तेज़ हवा और जल की भयंकरता के
मध्य, वह हाथ बढ़ा। वह हाथ, जिसने कुछ
देर पहले ही भूखों को तृप्त किया था, जिसने अंधकार में
प्रकाश फैलाया था, वही हाथ पतरस के लिए आगे आया। यीशु ने पतरस को अपने हाथों से
थाम लिया और पतरस को ऊपर खींचते हुए, उन्होंने कहा,
"हे अल्पविश्वासी, तुमने संदेह क्यों
किया?"
हम सभी नाव में स्तब्ध खड़े यह दृश्य देख रहे थे।
तूफान की तीव्रता अचानक मंद पड़ने लगी। पानी की उफान मानो प्रभु के आदेश पर थम गई।
और हम—डर और हताशा के इस खतरनाक सफर को
पार करते हुए—अपने गंतव्य तक पहुँचे। हमारी डगमगाती अवस्थाएँ, हमारे
टूटते विश्वास, और हमारी घबराई हुई रूह, सभी यीशु की उपस्थिति में स्थिरता और शांति प्राप्त कर चुकी थीं।
लेकिन उस दिन मेरे मन में एक सवाल उठा की “अगर यीशु
ने पतरस को बुलाया था, तो फिर वो डूबे क्यूँ?
और आज जब में यह सफ़र को सोचता हूँ तो मुझे मालूम चलता
है की उस दिन यह सब मेरे साथ क्यूँ हुआ ? मुझे लगता है, उस
दिन यीशु और उनके चेलो का जो सफ़र था, वो सिर्फ मुझे
निम्नलिखित बातें सिखाने के लिए ही था:
१.
हमारे सामान्य जीवन के प्रवाह में
अक्सर हम भूल बैठते है उस खुदा को जो खुद सर्वस्व है | हम परमेश्वर की
अद्भुत कृतियों, उनके चमत्कारों पर इतने मोहित हो जाते हैं कि उनके पीछे
छिपे वास्तविक स्वरूप को अनदेखा कर देते हैं। परमेश्वर के चमत्कार, उनकी
महिमा की झलक मात्र हैं, उनके होने का प्रमाण हैं, परंतु वे स्वयं परमेश्वर नहीं। जैसे सूर्य की किरणें हमें उसकी उपस्थिति
का आभास कराती हैं, परंतु स्वयं सूर्य का स्थान नहीं ले
सकतीं, वैसे ही चमत्कार हमें परमेश्वर की सामर्थ का दर्शन
कराते हैं, परंतु परमेश्वर का स्थान कभी नहीं ले सकते।
इसीलिए हमेशा याद रखिये, परमेश्वर के चमत्कार सिर्फ प्रकाश है, वो कभी प्रकाश के
स्रोत अर्थार्थ उस परमेश्वर की जगह नही ले सकते हैं |
२.
कई बार हम अपने जीवन में परमेश्वर के खास लोगों पर
अत्यधिक भरोसा कर बैठते हैं। उनके कार्यों, उनकी वाणी, और
उनके प्रभाव से प्रभावित होकर, हम उन्हें अपनी आशा का केंद्र
बना लेते हैं। परंतु भजन संहिता 118:8,9 हमें यह स्मरण दिलाता
है, “परमेश्वर की शरण लेनी, मनुष्य पर
भरोसा करने से उत्तम है, प्रधानों पर भरोसा करने से उत्तम
है।” मनुष्य चाहे वह कितना भी योग्य, प्रभावशाली या आत्मिक
क्यों न हो, इस संसार में केवल कुछ पलों के लिए उपस्थित होता
है। समय के साथ वह विलीन हो जाता है, उसकी सीमाएँ प्रकट हो
जाती हैं। परंतु हमारे परमेश्वर की उपस्थिति सदा से है और सदा तक बनी रहती है। वह
हर परिस्थिति, हर युग, और हर सीमा से
परे है। इसलिए, बेहतर यही है कि हम अपना भरोसा उस परमेश्वर
पर रखें, जो अटल है, अपरिवर्तनीय है।
३.
हम अपने जीवन के अनेक पहलुओं में अपनी स्वयं की
प्रतिभाओं पर भरोसा कर बैठते हैं। हम समझते हैं कि हमारी शक्ति, हमारी
समझ, और हमारे कौशल ही हमें सफलता की ओर ले जाएंगे। लेकिन
सच्चाई यह है कि हमारी प्रतिभाएं सीमित हैं | परमेश्वर का वचन नीतिवचन 3: 5,6 कहता है की तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन
सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना, उसी को स्मरण करने सब काम करना तब वो तेरे
लिए सीधा मार्ग निकलेगा” | इसीलिए अपनी प्रतिभाओं से उत्तम उस परमेश्वर पर
निर्भरता है |
४.
हमारे सामने भी ऐसे बहुत से लोग आयेंगे जो मेरी तरह
हर कदम आपके विश्वास को कमजोर करने की कोशिशे करेंगे, लेकिन हमेशा हर मुसीबतों,
सुख दुखों में सिर्फ उस परमेश्वर पर नज़र रखे, जिसने तुझे बुलाया है, वो
तुझे तेरी अंतिम सांस तक चलाने में सामर्थी है | वो तेरे सृजन से
लेकर अंत तक तेरे साथ है, वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। याद करे, यशायाह 49:
15,16 क्या कहता है “ “क्या कोई स्त्री
अपने दूध पीते बच्चे को भूल सकती है, वा अपने गर्भ से जन्मे
बेटे पर दया नहीं कर सकती? यदि वह भूल भी जाए, तो भी मैं तुझे नहीं भूलूँगा! देख, मैंने तेरा रूप अपनी
हथेलियों पर उकेरा है | याद रखे, अगर उसने बुलाया है, और हम
चले है, तो आगे की ज़िम्मेदारी उस खुदा की है, हमे बस उस पर भरोसा रखना है
५.
हमारी हर डूबती अवस्था में वो खुदा का हाथ हमेशा आपको
बचने के लिए आपके साथ रहेगा | मत्ती 28: 18 में यीशु मसीह कहता है “ की मैं जगत के
अंत तक तुम्हारे साथ रहूँगा” इसीलिए डरना की जरूरत नही है हमे, वो
खुदा हमेशा हमे सँभालने के लिए हमारे साथ खड़ा है, तुहारे हर आंसू को वो अपनी
कुप्पी में संभल कर हिसाब से रखता है, के वो आखिर एक दिन
तेरे खिलाफ खड़े हर लोगो से बदला लेगा | वह सच्चा साथी
है, जो हमें हर विपत्ति में बचाता है, हमारे दर्द और
आंसुओं को अपने पास संजोकर रखता है, और अपने समय में हमसे
किए गए हर अन्याय का हिसाब करेगा। हम किसी भी परिस्थिति में अकेले नहीं हैं;
उसका साथ हर कदम पर हमारे साथ होता है।
६.
हमारे जीवन में कई बार ऐसे पल आते है, जो
पहले हमने कभी अनुभव नही किये है, न हमे द्केहे है, न कभी जाने है, कुछ नया, कुछ अनजाना अनुभव | तो वो डरने का वक़्त नहीं,
तैयार होने का वक़्त होगा, क्यूंकि जब ऐसे अनुभव आते है, तो यह संकेत है की परमेश्वर कुछ नया करने जा रहा है हमारी जिंदगी में, वो तुम्हें उसी मिट्टी से तराश कर, एक नई ऊँचाई पर
पहुँचाने को है, जहाँ तुमने सोचा भी न होगा, वो दरवाज़े खोलने वाला है। एक नए अवस्था में आप पहुँचने वाले है | इसीलिए
हमेशा तैयार रहे अपनी नए अनुभवों का सामना करते हुए की परमेश्वर एक नयी सिख, एक नए अंदाज़ में आपको बदलने जा रहा है |
७.
इस कहानी से हमें एक और महत्वपूर्ण
शिक्षा मिलती है:जब वह माँ और बेटा अपनी सबसे गरीब और कमजोर अवस्था में थे, जब उनके पास स्वयं के लिए भी कुछ नहीं था, तब भी
उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ उस परमेश्वर को समर्पित कर दिया। याद रखें, हमें अपना सर्वश्रेष्ठ उसी परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए, जो हर आशीष का स्त्रोत है। वह हमारे छोटे से समर्पण को भी अपनी असीम कृपा
से अनंत में बदलने की सामर्थ्य रखता है। जब हम अपने दिल से, अपनी
निष्ठा और प्रेम के साथ उसे अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, तो
वह अपनी बहुतायत की आशीषों के द्वार खोल देता है। स्वर्ग के भंडारों से वह हमें
इतना भर देगा कि हमारे जीवन में किसी भी चीज़ की कमी न रहे।
८.
यदि अपने जीवन में उस परमेश्वर की आशीषों को पाना
चाहते हो, उसकी उपस्थिति का अनुभव करना चाहते हो, और उसकी चंगाई को प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें
उसके लिए प्यासा और उसके वचनों के लिए भूखा होना पड़ेगा। सोचो, उस भीड़ को जो यीशु की खोज में पैदल ही निकल पड़ी थी। उनके पास न तो आराम
था, न कोई साधन, लेकिन उनके भीतर एक
गहरी प्यास थी—उस परमेश्वर से मिलने की, उसके दिव्य वचनों को
सुनने की। और यही प्यास उन्हें वहाँ ले गई, जहाँ परमेश्वर ने
न केवल उनकी आत्मा को तृप्त किया, बल्कि उनके जीवन में अपनी
उपस्थिति और कृपा की छाप छोड़ी। परमेश्वर उन्हीं को भरता है, जो सच में उसकी चाह रखते हैं। जब हम अपने पूरे दिल, आत्मा
और विश्वास के साथ उसकी ओर बढ़ते हैं, तो वह हमें हर अभाव से
निकालकर पूर्णता और तृप्तता से भर देता है।
मेरे दोस्तों, यह
मेरी गवाही हमारे जीवन की बहुत सी सच्चाईयों और शिक्षाओं से परिचित करवाती है, जो
हमे समझनी चाहिए | जीवन की तूफानी परिस्थितियाँ, डर और
अनिश्चितता हमें घेरने का प्रयास करती हैं, लेकिन यीशु की
उपस्थिति हमें विश्वास दिलाती है कि हर डगमगाते कदम पर वह हमारे साथ है। कहानी
हमें सिखाती है कि हमें परमेश्वर के चमत्कारों से अधिक स्वयं परमेश्वर पर भरोसा
करना चाहिए। हमें मनुष्यों और अपनी प्रतिभाओं पर नहीं, बल्कि
उस अनंत और सामर्थी परमेश्वर पर विश्वास रखना चाहिए, जिसने
हमें बुलाहट दी है, वो अंत तक चलाने में सामर्थी है | जब भी जीवन हमें डुबाने की
कोशिश करता है, परमेश्वर का हाथ हमें थामने के लिए हमेशा
तैयार रहता है। उसकी आशीषें हमारी सीमाओं से परे हैं, और
उसका प्रेम हमारे हर आँसू को संजोता है। वह हमें सिखाता है कि जीवन में जो कुछ
हमारे पास है, उसे उसे समर्पित कर दें, क्योंकि वह हमारी भेंट को कई गुना बढ़ाकर लौटाने में सक्षम है। यह कहानी
हमें यह भी प्रेरणा देती है कि जीवन में जो कुछ पहले कभी अनुभव नहीं हुआ, वह डरने की बात नहीं, बल्कि परमेश्वर द्वारा हमें एक
नई ऊँचाई पर पहुँचाने का संकेत हो सकता है। अंततः, कहानी
हमें यह विश्वास दिलाती है कि अगर हम उस परमेश्वर की प्यास और भूख में उसे सच्चे
दिल से खोजेंगे, तो वह न केवल हमें अपनी बरकतों से भर देगा,
बल्कि हमारी हर जरूरत को पूरा करेगा। इस यात्रा में, हमारा भरोसा, हमारी प्यास, और
हमारा समर्पण ही वह जरिया है जो हमें उसकी उपस्थिति का अनुभव करने और जीवन में
उसकी महान योजनाओं का हिस्सा बनने के योग्य बनाता है।
अब यह सवाल है की हम
बदले है ? या नही ? इस बार फिर बदलने का मौका उसने हमे दिया है | तारीफ़ उसकी हम
करे, यह
हक उसने हमे दिया | हो शुक्रिया खुदा का जिसने जीवन हमे दिया |
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